महाराष्ट्र सरकार की नई सोलर बैंकिंग और बैटरी स्टोरेज पॉलिसी से डेटा सेंटर डेवलपर्स के लिए लागत बढ़ गई है। निवेशकों को अब इन रेगुलेटरी बदलावों के चलते प्रोजेक्ट मार्जिन और पावर परचेज स्ट्रैटेजी पर बारीक नजर रखने की जरूरत है।
महाराष्ट्र में डेटा सेंटर इंडस्ट्री अब एक बड़े आर्थिक संकट की ओर देख रही है। महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (MERC) के नए नियमों ने ऑपरेटरों के बिजनेस मॉडल के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।\n\n### 'सेम-स्लॉट' बैंकिंग का असर\nमुख्य समस्या नई 'सेम-स्लॉट' बैंकिंग फ्रेमवर्क से है। पहले कंपनियां दिन में बनी सोलर एनर्जी को 'बैंक' कर रात या पीक आवर्स में इस्तेमाल कर लेती थीं, लेकिन अब इसे 9:00 AM से 5:00 PM के बीच ही सीमित कर दिया गया है। चूंकि डेटा सेंटर्स को 24 घंटे पावर चाहिए, इसलिए अब उन्हें पीक आवर्स में ग्रिड से बिजली लेनी पड़ रही है, जिस पर 20% तक ज्यादा 'टाइम-ऑफ-डे' (ToD) टैरिफ देना पड़ रहा है।\n\n### भारी पड़ेगा BESS मैंडेट\nनई 'रिन्यूएबल एनर्जी और एनर्जी स्टोरेज पॉलिसी (2025-36)' के तहत, 100 किलोवाट से बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए 'बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम' (BESS) लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। इसमें प्रोजेक्ट की 50% क्षमता को कम से कम 2 घंटे तक स्टोर करना होगा। यह कदम MSEDCL पर बोझ कम करने के लिए उठाया गया है, जो पहले से ही ₹88,400 करोड़ के कृषि बकाया के दबाव में है। लेकिन, इससे डेटा सेंटर कंपनियों का अपफ्रंट कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) काफी बढ़ गया है।\n\n### इन्वेस्टर के लिए क्या है संकेत?\nराज्य में सूखे की स्थिति और पानी की किल्लत के कारण भी डेटा सेंटर्स के लिए अनुपालन (compliance) महंगा हो रहा है। निवेशक अब आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों की ओर देख रहे हैं, जहाँ अधिक लचीली नीतियां मिल रही हैं। अब निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे कंपनियों के EBITDA मार्जिन और पावर परचेज एग्रीमेंट्स की समीक्षा पर नजर रखें, ताकि यह समझ सकें कि कंपनियां इन बढ़ी हुई लागतों को कैसे मैनेज कर रही हैं।
