महाराष्ट्र में स्मार्ट मीटर लगाने का बड़ा अभियान अब जनता के विरोध का सामना कर रहा है। लोगों का आरोप है कि इन मीटरों से बिजली के बिलों में भारी बढ़ोत्तरी हो रही है और इन्हें जबरन लगाया जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह राष्ट्रीय Revamped Distribution Sector Scheme के तहत एक ज़रूरी कदम है, लेकिन नागरिक बिलिंग में ज़्यादा पारदर्शिता और प्राइवेसी की मांग कर रहे हैं।
Detailed Coverage
स्मार्ट मीटर पर बवाल: क्यों नाराज हैं महाराष्ट्र के लोग?
महाराष्ट्र में बिजली के स्मार्ट मीटर लगाने का काम तेज़ी से चल रहा है, लेकिन मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों में जनता का ज़ोरदार विरोध देखने को मिल रहा है। लोगों को बिलिंग के तरीके और मीटर लगाने की प्रक्रिया पर आपत्ति है। यह प्रोजेक्ट देशव्यापी Revamped Distribution Sector Scheme का हिस्सा है, जिसके तहत लगभग 2.4 करोड़ पुराने मीटरों को बदलकर ग्रिड को बेहतर बनाने और बिजली की चोरी व नुकसान को कम करने का लक्ष्य है।
बिजली कंपनियों और उपभोक्ताओं पर असर
इस प्रोजेक्ट में MSEDCL, BEST, Adani Electricity, Tata Power और Torrent Power जैसी बड़ी बिजली वितरण कंपनियां शामिल हैं। स्मार्ट मीटर से मीटर रीडिंग ऑटोमेटिक हो जाती है और बिजली चोरी का पता लगाना आसान होता है। लेकिन, इस बदलाव के बाद से अचानक बिजली के बिलों में भारी इज़ाफ़ा होने की खबरें आ रही हैं। कई उपभोक्ता समूह और एक्टिविस्ट सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह बढ़ोत्तरी असल खपत के कारण है या तकनीकी गड़बड़ी की वजह से। पुणे और कल्याण जैसे इलाकों से ऐसी खबरें हैं जहाँ लोग पुराने मीटर वापस लगाने की मांग कर रहे हैं।
सरकारी पक्ष और नियम
महाराष्ट्र विधानसभा में सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्मार्ट मीटर की तरफ यह बदलाव Electricity Act, 2003 और Central Electricity Authority के नियमों के अनुसार ही हो रहा है। अधिकारियों के अनुसार, 1.2 करोड़ से ज़्यादा स्मार्ट मीटर लगने के बावजूद MSEDCL को करीब 3.9 लाख शिकायतें मिली हैं। शुरुआती जांच में सरकार ने पाया कि कई बिलिंग शिकायतें निराधार थीं। ऐसा माना जा रहा है कि पुराने, खराब मीटर शायद सालों से असल खपत से कम बिलिंग कर रहे थे।
निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
बिजली वितरण सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, इस इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड की सफलता कंपनियों की लॉन्ग-टर्म वित्तीय सेहत के लिए ज़रूरी है। इससे टेक्निकल और कमर्शियल नुकसान कम होने की उम्मीद है। हालांकि, इस टेक्नोलॉजी को अपनाने की रफ़्तार और जनता की स्वीकृति एक बड़ा ऑपरेशनल रिस्क है। अगर विरोध बढ़ता है, तो वितरण कंपनियों पर रेगुलेटरी दबाव बढ़ सकता है, प्रोजेक्ट में देरी हो सकती है, या उन्हें ज़्यादा मज़बूत कंज्यूमर ग्रीवेंस रिड्रेसल सिस्टम बनाने पड़ सकते हैं। इससे प्रोजेक्ट के टाइमलाइन और कस्टमर सैटिस्फैक्शन पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों को सरकार की कंज्यूमर कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजी, बिलिंग पारदर्शिता नीतियों में संभावित बदलावों और 85-पैसे प्रति यूनिट वाले सोलर-आवर डिस्काउंट की प्रगति पर नज़र रखनी चाहिए। यह देखना अहम होगा कि बिजली कंपनियां जनता की नाराजगी को कैसे संभालती हैं और साथ ही इंस्टॉलेशन के लक्ष्य भी पूरे करती हैं।
