पश्चिम एशिया में हॉरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक नया और गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इस संकट में, लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) का आयात कच्चे तेल (Crude Oil) की तुलना में कहीं ज़्यादा असुरक्षित दिखाई दे रहा है।
इस तनाव की वजह से ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें सात महीने के उच्चतम स्तर के करीब $73 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। अच्छी बात यह है कि भारत की रिफाइनरियों के पास करीब 10-15 दिन का क्रूड ऑयल स्टॉक और 7-10 दिन का फ्यूल स्टॉक मौजूद है, जो कुछ समय के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगा। लेकिन LPG की स्थिति बहुत नाजुक है। भारत के कुल LPG आयात का करीब 80-85% हिस्सा हॉरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है, और इसके ज़्यादातर सप्लायर खाड़ी देशों से हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत के पास कच्चे तेल के भंडार के मुकाबले LPG के कोई बड़े स्ट्रैटेजिक रिजर्व (strategic reserves) नहीं हैं। ऐसे में, हॉरमुज़ में किसी भी तरह की रुकावट से LPG की सप्लाई और कीमतों पर फौरन असर पड़ेगा।
भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश अपनी लगभग 87-91% क्रूड ऑयल की ज़रूरत और करीब 50% लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का आयात करता है। हॉरमुज़ जलडमरूमध्य भारत के क्रूड ऑयल आयात का करीब 50% और LNG का करीब 60% हिस्सा पार कराता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ता है। अनुमान है कि हर $1 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से सालाना इंपोर्ट बिल $2 अरब बढ़ जाता है, जिससे Current Account Deficit (CAD) और बिगड़ता है और भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर दबाव आता है। हालांकि, फाइनेंशियल ईयर 2025-26 की तीसरी तिमाही में CAD घटकर GDP का 1.3% रह गया था, लेकिन लगातार टैरिफ दबाव के कारण FY26 के लिए इसके बढ़कर 1.7% तक पहुंचने का अनुमान है। एनालिस्ट्स का मानना है कि 2026 तक रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 86-92 के बीच स्थिर रह सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम और व्यापार अनिश्चितताएं इसे प्रभावित कर सकती हैं।
यह सच है कि जापान (जो अपनी 87% ऊर्जा ज़रूरतों के लिए हॉरमुज़ का इस्तेमाल करता है) और दक्षिण कोरिया (जो 81% के लिए इस मार्ग पर निर्भर है) की तुलना में भारत पर सीधा जोखिम कम है। लेकिन, एशिया में सबसे ज़्यादा जोखिम झेलने वाले बड़े आयातकों में भारत तीसरे स्थान पर है। मध्य पूर्व के सप्लायर्स पर निर्भरता कम करने के लिए, भारत ने अमेरिका से भी करीब 10% LPG आयात करना शुरू कर दिया है। इसमें माल ढुलाई का खर्च ज़्यादा आता है, लेकिन यह सप्लाई रूट को डायवर्सिफाई (diversify) करता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के ढांचे में स्ट्रैटेजिक LPG रिजर्व का न होना एक बड़ी कमजोरी है। जहां क्रूड ऑयल के लिए 10-15 दिन का इन्वेंटरी स्टॉक एक बफर देता है, वहीं LPG सप्लाई तुरंत असुरक्षित हो जाती है। क्रूड की तुलना में LPG खरीद को डायवर्सिफाई करना कहीं ज़्यादा मुश्किल है, क्योंकि इसके कॉन्ट्रैक्ट स्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स (logistics) की अपनी जटिलताएं हैं। अगर हॉरमुज़ जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है, तो कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जैसा कि 1970 के दशक के तेल झटकों के दौरान हुआ था। कच्चे तेल की हर $1 प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के इंपोर्ट बिल में $2 अरब जोड़ती है, जो सीधे तौर पर CAD और रुपये पर दबाव डालती है। इससे महंगाई बढ़ेगी और सरकार को एक्साइज ड्यूटी (excise duty) जैसे उपायों पर विचार करना पड़ सकता है, जिससे सरकारी खजाने पर असर पड़ेगा। ऑयल मार्केटिंग, पेंट, टायर और केमिकल मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर बढ़ती इनपुट कॉस्ट (input costs) के कारण मार्जिन में दबाव झेल सकते हैं। हालांकि क्रूड को रूस या अन्य सप्लायर से आंशिक रूप से बदला जा सकता है, लेकिन LPG के लिए नए लॉन्ग-टर्म एग्रीमेंट (long-term agreements) सुरक्षित करना और ज़्यादा फ्रेट (freight) खर्च उठाना पड़ता है। ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में झटकों के कारण CAD काफी बढ़ जाता है, जैसे 2008 में यह GDP का 11% था।
फिलहाल, क्रूड ऑयल की मौजूदा इन्वेंटरी सप्लाई शॉक के खिलाफ अल्पकालिक सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन, हॉरमुज़ जलडमरूमध्य में लंबा तनाव LPG और कुछ हद तक LNG बाजारों के लिए एक गंभीर जोखिम बना हुआ है। एनालिस्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में इक्विटी परफॉर्मेंस (equity performance) के लिए तेल की कीमतों की चाल सबसे बड़ा फैक्टर रहेगी। भारत का LPG सप्लायर्स को डायवर्सिफाई करने का रणनीतिक कदम, खासकर अमेरिका से आयात बढ़ाने का प्रयास, भविष्य में सप्लाई में रुकावटों से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। 2026 में रुपये की चाल को तय करने में अमेरिका और भारत के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं का नतीजा अहम होगा। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) इस स्थिति पर बारीकी से नज़र रखे हुए है। वे मानते हैं कि भले ही मौजूदा ग्लोबल मार्केट में सप्लाई पर्याप्त है, लेकिन हॉरमुज़ के रास्ते भारत की रणनीतिक भेद्यता (strategic vulnerability) एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।
