संस्थागत निवेशकों का भरोसा
भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने NHPC लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 5.68% कर ली है। यह कदम भारत के जलविद्युत क्षेत्र (hydropower sector) में संस्थागत निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। 2 जून, 2026 को 7.68 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदे जाने के बाद, LIC अब भारत सरकार के साथ एक प्रमुख शेयरधारक के रूप में स्थापित हो गया है। यह खरीदारी तब हुई जब कंपनी के ऑफर फॉर सेल (OFS) के लिए ₹71 का फ्लोर प्राइस रखा गया था, जो पिछले क्लोजिंग प्राइस से करीब 8% कम था। इस वजह से 2 जून को शेयर में थोड़ी गिरावट आई थी।
OFS की चाल और बाज़ार की प्रतिक्रिया
सरकार के विनिवेश (disinvestment) पर बाज़ार की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही। संस्थागत निवेशकों (non-retail segment) के लिए खुला पहला दिन 3.47 गुना सब्सक्राइब हुआ। इसके चलते DIPAM ने 3% की ग्रीनशू ऑप्शन (greenshoe option) का इस्तेमाल किया, जिससे कुल विनिवेश 6% तक पहुंच गया। OFS की घोषणा के बाद शेयर में करीब 7% की गिरावट आई थी, लेकिन 3 जून को रिटेल बिडिंग खुलने पर इसमें करीब 4-5% की रिकवरी देखी गई।
जोखिमों पर एक नज़र
निवेशकों को लिक्विडिटी इवेंट (liquidity event) से परे जाकर कुछ संरचनात्मक चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। निजी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के विपरीत, NHPC रेगुलेटेड टैरिफ के ढांचे में काम करती है, जो अक्सर बढ़ती बिजली मांग के बावजूद मुनाफे को सीमित कर सकता है। कंपनी का विकास लंबे प्रोजेक्ट साइकल और मानसून पर निर्भरता से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, पिछले पांच सालों में कंपनी की सेल्स ग्रोथ में खास बढ़ोतरी न होने की चिंताएं भी बनी हुई हैं। ऑपरेशनल जोखिम भी कम नहीं हैं; जैसे कि तीस्ता-V पावर स्टेशन में भूस्खलन (landslides) जैसी घटनाएं बड़े पैमाने पर बहाली के प्रयासों की मांग करती हैं, जो बड़े पैमाने पर हाइड्रोइलेक्ट्रिक डेवलपमेंट से जुड़े भौगोलिक और पर्यावरणीय जोखिमों को उजागर करती हैं। साथ ही, 1.2 से अधिक के डेट-टू-इक्विटी रेशियो (debt-to-equity ratio) के साथ, मौजूदा ऊंची ब्याज दरों के माहौल में कंपनी का लीवरेज (leverage) प्रोफाइल सावधानी बरतने का संकेत देता है।
भविष्य का आउटलुक
ब्रोकरेज फर्मों का नज़रिया अभी भी कंपनी के वैल्यूएशन को लेकर थोड़ा सतर्क है, क्योंकि वर्तमान P/E रेशियो करीब 20-21 के आसपास बना हुआ है। हालांकि पंप स्टोरेज (pumped storage) और सोलर एसेट्स में कंपनी का विस्तार भारत के लॉन्ग-टर्म क्लीन एनर्जी लक्ष्यों के अनुरूप है, लेकिन रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) में मध्यम सुधार बताता है कि आने वाले फाइनेंशियल इयर्स में मैनेजमेंट के लिए एफिशिएंसी बढ़ाना एक बड़ी चुनौती रहेगी।
