केरल में बिजली की भारी किल्लत हो गई है। डिमांड सामान्य स्तर से **800 MW** तक ऊपर चली गई है। कम मानसून और गर्मी की मार के चलते राज्य को शाम के पीक आवर्स में लोड शेडिंग का सामना करना पड़ सकता है।
बिजली की मांग और सप्लाई का गणित
केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (KSEB) के सामने इस समय गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। राज्य में बिजली की डिमांड अपने ऐतिहासिक औसत से 500 से 800 MW अधिक दर्ज की गई है। शाम 6 बजे से रात 12 बजे तक के पीक आवर्स में बिजली बनाए रखना बोर्ड के लिए बड़ी मुश्किल बना हुआ है।
मानसून और गर्मी का डबल अटैक
इस संकट के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहली, भीषण गर्मी के चलते कूलिंग उपकरणों (AC और पंखे) का इस्तेमाल रिकॉर्ड स्तर पर है। दूसरी ओर, दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने से जलाशयों में पानी का स्तर गिर गया है, जिससे हाइड्रोइलेक्ट्रिक (Hydroelectric) पावर जनरेशन पर बुरा असर पड़ा है।
नेशनल ग्रिड पर दबाव और वित्तीय चोट
पूरे भारत में नेशनल पावर ग्रिड में 12,000 MW का स्ट्रक्चरल डेफिसिट (Deficit) बना हुआ है। ऐसे में KSEB को रियल-टाइम मार्केट (RTM) से महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है। चूंकि बाजार में बिजली की सीमित सप्लाई और हाई कॉम्पिटिशन है, इसलिए यह खरीद बोर्ड के फाइनेंशियल हेल्थ पर सीधा प्रहार कर रही है।
इंडस्ट्री के लिए क्या हैं खतरे?
बिजली की यह अनिश्चितता इंडस्ट्रीज के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर रही है। मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस को सुचारू रखने के लिए बिजली अनिवार्य है। अगर लोड शेडिंग का सिलसिला लंबा खिंचा, तो कंपनियों को डीजल जेनरेटर जैसे महंगे बैकअप का सहारा लेना पड़ेगा, जिससे उनका ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ जाएगा। आने वाले हफ्तों में निवेशकों को जलाशयों के लेवल और ग्रिड फ्रीक्वेंसी की स्थिरता पर नजर रखनी होगी।
