Karnataka सरकार ने राज्य की पावर कैपेसिटी को 2030 तक बढ़ाकर **66 GW** करने का बड़ा ऐलान किया है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए **₹2-3 लाख करोड़** के निजी निवेश की उम्मीद है, ताकि बढ़ते डेटा सेंटर्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
बड़े निवेश की तैयारी
कर्नाटक ऊर्जा विभाग ने एक नया रोडमैप तैयार किया है, जिसके तहत राज्य की कुल पावर जनरेशन क्षमता को मौजूदा 39 GW से बढ़ाकर 66 GW तक ले जाया जाएगा। इस विस्तार के लिए सरकार ने अगले कुछ वर्षों में ₹2 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ तक के प्राइवेट इन्वेस्टमेंट का अनुमान लगाया है। इस पूंजी को आकर्षित करने के लिए सरकार लैंड रेगुलेशंस के डिजिटलाइजेशन और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस मॉडल पर काम कर रही है।
क्यों है इतने पावर की जरूरत?
इस विस्तार के पीछे मुख्य वजह राज्य में बिजली की मांग में बेतहाशा बढ़ोतरी है। बेंगलुरु, मैसूर और मंगलुरु जैसे शहरों में डेटा सेंटर्स का तेजी से आना और इलेक्ट्रिक व्हीकल की बढ़ती संख्या पावर इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव डाल रही है। फिलहाल राज्य की दो-तिहाई बिजली रिन्यूएबल और हाइड्रो सोर्सेज से आती है, जिसे सरकार आगे भी बरकरार रखना चाहती है।
प्रमुख प्रोजेक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर
इस मिशन को गति देने के लिए 2,000 MW के 'शरावती पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट' (Sharavathy Pumped Storage Project) पर काम तेजी से चल रहा है। साथ ही, कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड के सबस्टेशनों में बड़े पैमाने पर 'बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम' (BESS) को इंटीग्रेट करने की योजना है, जो सौर और पवन ऊर्जा जैसे अस्थिर पावर सोर्सेज के दौरान ग्रिड को स्टेबल रखने में मदद करेगा।
निवेशकों के लिए चेतावनी
इन्वेस्टमेंट का यह बड़ा मौका अपने साथ कुछ चुनौतियां भी लाया है। राज्य की डिस्कॉम (Distribution Companies) की खस्ताहाल आर्थिक स्थिति निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकती है। अगर इन कंपनियों पर कर्ज का बोझ बना रहा, तो पावर प्रोड्यूसर्स को समय पर पेमेंट मिलने में दिक्कत आ सकती है, जो काउंटरपार्टी रिस्क पैदा करेगा। साथ ही, अगर पावर जनरेशन के साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क तेजी से विकसित नहीं हुआ, तो बिजली वेस्ट होने का खतरा भी बना रहेगा।
