कर्नाटक ने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। राज्य अब अपनी **70%** बिजली की मांग को नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरा कर रहा है। हालांकि, इस शानदार उपलब्धि के बीच राज्य की पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (ESCOMs) पर बढ़ता कर्ज और बिजली दरों में हुई बढ़ोतरी निवेशकों और आम जनता के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
कर्नाटक ने ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा माइलस्टोन हासिल कर लिया है। राज्य की कुल बिजली मांग का 70% हिस्सा अब रिन्यूएबल एनर्जी से पूरा हो रहा है। इस सफलता के पीछे राज्य की 27.3 GW की रिन्यूएबल क्षमता है, जिसमें 11.5 GW सोलर और 8.5 GW विंड एनर्जी शामिल है। राज्य का लक्ष्य 2030 तक कुल पावर जनरेशन क्षमता को बढ़ाकर 66 GW करना है, ताकि डेटा सेंटर्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।
ग्रिड की चुनौतियां और स्टोरेज की जरूरत
भले ही ग्रीन एनर्जी का आंकड़ा उत्साहजनक है, लेकिन इससे ग्रिड मैनेजमेंट में दिक्कतें आ रही हैं। सोलर और विंड एनर्जी की अनिश्चितता के कारण शाम के समय, जब सोलर पावर कम हो जाती है, सप्लाई बनाए रखना बड़ी चुनौती है। इससे निपटने के लिए राज्य सरकार अब बैटरी स्टोरेज और पंप-स्टोरेज प्रोजेक्ट्स पर तेजी से निवेश कर रही है, ताकि ग्रिड की स्टेबिलिटी बनी रहे।
डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की माली हालत
ग्रीन एनर्जी की चमक के पीछे ESCOMs (पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों) की वित्तीय सेहत खराब है। साल 2026 की शुरुआत तक इन कंपनियों का कुल कर्ज ₹42,750 करोड़ तक पहुंच गया है। इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए कर्नाटक इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन ने Bangalore Electricity Supply Company के ग्राहकों पर 56 पैसे प्रति यूनिट का 'ट्रू-अप' चार्ज लगाया है। यह फैसला बताता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और कंपनियों की बैलेंस शीट सुधारने के बीच का तालमेल कितना कठिन है।
भविष्य की राह
अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि राज्य 2,000 MW के Sharavathy पंप-स्टोरेज जैसे प्रोजेक्ट्स को कैसे पूरा करता है। एनर्जी सेक्टर के जानकारों का मानना है कि ग्रीन ट्रांजिशन के साथ-साथ डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाना, राज्य के पावर सेक्टर की असली परीक्षा होगी।
