ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपने आर्थिक प्रतिबंध खत्म नहीं करता और नौसैनिक गतिविधियां बंद नहीं करता, तब तक Strait of Hormuz खुला नहीं रहेगा। इस स्थिति से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चैन पर भारी दबाव बना हुआ है, जो भारत जैसे ऊर्जा आयात करने वाले देशों के लिए बड़े आर्थिक जोखिम का संकेत है।
Strait of Hormuz की नाकाबंदी पर अब कूटनीतिक स्थिति पूरी तरह साफ हो चुकी है। नई दिल्ली में आयोजित BRICS समिट के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका अपने आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाता और अप्रैल 2026 से चल रहे अपने नौसैनिक अभियानों को नहीं रोकता, तब तक यह समुद्री मार्ग बंद ही रहेगा।
वैश्विक सप्लाई पर कितना असर?
दुनिया भर में तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई का सबसे बड़ा जरिया माने जाने वाला यह रास्ता 28 फरवरी 2026 से ही कमर्शियल ट्रांजिट के लिए बंद है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की कुल तेल और गैस सप्लाई का करीब 20% हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इस रुकावट ने पूरी दुनिया के एनर्जी मार्केट में अनिश्चितता पैदा कर दी है।
भारतीय निवेशकों के लिए जोखिम
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल के तौर पर आयात करता है। ऐसे में, इस समुद्री मार्ग का लंबे समय तक बंद रहना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के इंपोर्ट बिल और महंगाई पर पड़ता है। साथ ही, अलग-अलग सेक्टर की कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर भी इसका बुरा असर देखने को मिल रहा है।
मार्केट और कूटनीतिक हलचल
फिलहाल, मार्केट की नजर इस बात पर है कि क्या ब्रिक्स समिट या ओमान जैसे देशों की मध्यस्थता से कोई कूटनीतिक रास्ता निकलता है। अभी तक ईरान का रुख काफी सख्त है, जिसे वह बाहरी आर्थिक और सैन्य दबाव के जवाब में 'रक्षात्मक कार्रवाई' बता रहा है। निवेशकों को सलाह है कि वे ग्लोबल क्रूड ऑयल बेंचमार्क और इस समुद्री गलियारे से जुड़ी खबरों पर पैनी नजर रखें, क्योंकि कूटनीतिक मोर्चे पर कोई भी हलचल सीधे तौर पर एनर्जी की कीमतों में भारी बदलाव ला सकती है।
