ईरान संकट का बड़ा असर: गैस की सप्लाई ठप्प, एशिया और यूरोप अब कोयले पर लौटेंगे!

ENERGY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
ईरान संकट का बड़ा असर: गैस की सप्लाई ठप्प, एशिया और यूरोप अब कोयले पर लौटेंगे!
Overview

ईरान में चल रहे एक गंभीर संघर्ष ने प्राकृतिक गैस (Natural Gas) की सप्लाई में भारी व्यवधान पैदा कर दिया है। इसके चलते एशिया और यूरोप के कई प्रमुख देश गैस की ऊंची कीमतों और कमी से निपटने के लिए कोयले (Coal) का उपयोग बढ़ाने की ओर बढ़ रहे हैं।

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एनर्जी मार्केट में मचा हड़कंप

पर्शियन गल्फ (Persian Gulf) क्षेत्र में जारी संघर्ष के चलते प्राकृतिक गैस की सप्लाई में आई इस बड़ी गड़बड़ ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट (Global Energy Market) को झकझोर कर रख दिया है। पिछले चार सालों में यह दूसरा बड़ा झटका है, जिसके कारण एशिया और यूरोप के बड़े ऊर्जा उपभोक्ता अपनी एनर्जी स्ट्रैटेजी (Energy Strategy) पर दोबारा विचार करने को मजबूर हो गए हैं। ऐसे में, कोयला (Coal), भले ही यह एक ज़्यादा 'गंदा' (dirtier) ईंधन है, फिर भी एक आसानी से उपलब्ध विकल्प के तौर पर सामने आ रहा है।

एशिया का कोयले की ओर झुकाव

लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के बड़े आयातक जापान, अब कोयला पावर जनरेशन (Coal Power Generation) बढ़ाने की योजना बना रहा है। बांग्लादेश और भारत पहले से ही गैस की कमी को पूरा करने के लिए कोयले पर अपनी निर्भरता बढ़ा चुके हैं। दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे अन्य एशियाई देश भी एलएनजी (LNG) के महंगा और दुर्लभ होने पर कोयले का उपयोग बढ़ाने की स्थिति में आ सकते हैं।

यूरोप की पुरानी राह पर वापसी?

यूरोप में, जहां कोयला पावर को काफी हद तक बंद किया जा रहा था, वहां नीदरलैंड, पोलैंड और चेक गणराज्य जैसे देश भी गैस की कीमतें ऊंची रहने पर कोयले का इस्तेमाल बढ़ाने का फैसला कर सकते हैं। जर्मनी भी बिजली के बिल कम करने के लिए बंद पड़े कोयला प्लांट्स को फिर से चालू करने पर विचार कर रहा है। हालांकि, यूरोप की कोयला जनरेशन कैपेसिटी (Coal Generation Capacity) सीमित है, जो 2015 से 45% तक घट चुकी है।

एक्सपर्ट्स की राय

गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) में कमोडिटीज रिसर्च (Commodities Research) की ग्लोबल को-हेड, Samantha Dart का कहना है कि एनर्जी शॉक (Energy Shock) से लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक शिफ्ट (Long-term Strategic Shift) संभव है। देश कोयले पर लंबी अवधि तक निर्भर रह सकते हैं और नेचुरल गैस (Natural Gas) पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) डेवलपमेंट को तेज़ी दे सकते हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के डायरेक्टर Fatih Birol का भी मानना है कि महंगी एनर्जी के चलते पावर जनरेशन (Power Generation) और इंडस्ट्री (Industry) दोनों में कोयले की डिमांड बढ़ने की उम्मीद है।

भारत का कोयला दांव

भारत में, इस संघर्ष के कारण फ्यूल की कमी (Fuel Shortages) हो रही है, खासकर जब बढ़ता तापमान एनर्जी डिमांड को बढ़ा रहा है। भारतीय अथॉरिटीज (Authorities) कोयला प्लांट्स के मेंटेनेंस (Maintenance) को टालने और टाटा पावर कंपनी (Tata Power Co.) की गुजरात फैसिलिटी को फुल कैपेसिटी (Full Capacity) पर चलाने के निर्देश दे चुकी हैं। डोमेस्टिक डिमांड (Domestic Demand) में बढ़ोतरी के कारण कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Ltd.) के शेयर मल्टी-ईयर हाई (Multi-year High) पर पहुंच गए हैं। कोयले का इस्तेमाल यहां पेट्रोलियम और गैस की जगह किया जा रहा है, खासकर सीमेंट जैसे उद्योगों के लिए।

ग्लोबल डिमांड पर असर

दुनिया भर में इस दशक में कोयले की डिमांड में गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा था। लेकिन, मौजूदा जियोपॉलिटिकल अस्थिरता (Geopolitical Instability) के चलते यह अनुमान गलत साबित होने की संभावना है। WRI Polsky Center के Doug Arent बताते हैं कि तत्काल एनर्जी जरूरतों को पूरा करना और उत्पादकता बनाए रखना इस समय प्राथमिकता है, जिससे शॉर्ट से मीडियम टर्म में जलवायु संबंधी चिंताओं (Climate Concerns) को दरकिनार किया जा सकता है। कोयले पर यह नई निर्भरता हानिकारक उत्सर्जन (Harmful Emissions) को कम करने में हुई सालों की प्रगति को उलट सकती है।

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