सरकार के Coal Gasification मिशन को लेकर बड़ी खबर है। NTPC और Adani जैसी दिग्गजों समेत **7** कंपनियों ने आवेदन तो किए, लेकिन भारी-भरकम लागत और कोयले की क्वालिटी जैसी चुनौतियों के कारण प्रोजेक्ट्स की राह आसान नहीं दिख रही है।
सरकारी स्तर पर केमिकल और फर्टिलाइजर के आयात को कम करने के लिए शुरू की गई कोल गैसीफिकेशन योजना पर अब वित्तीय संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मई 2026 में कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद, इस ₹37,500 करोड़ की इंसेटिव स्कीम के लिए NTPC Limited, Adani Enterprises, Talcher Fertilisers, Gallantt Ispat और Shyam Sel & Power जैसी कंपनियों ने प्रस्ताव पेश किए हैं। हालांकि, सरकार की ओर से 20% तक की वित्तीय सहायता मिलने के बावजूद, प्रोजेक्ट्स की शुरुआती लागत इतनी ज्यादा है कि कई कंपनियां अभी भी हिचकिचा रही हैं।
वित्तीय और तकनीकी चुनौतियां
कोयले को मेथनॉल और अमोनिया जैसे फीडस्टॉक में बदलना काफी खर्चीला काम है। इसके अलावा, भारत में कोयले की क्वालिटी (हाई ऐश कंटेंट) एक बड़ी बाधा है। इसे प्रोसेस करने के लिए महंगी टेक्नोलॉजी चाहिए, जिससे कंपनियों पर फाइनेंशियल रिस्क बढ़ जाता है।
क्यों केवल बड़ी कंपनियों का है दबदबा?
प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी भारी पूंजी और तकनीक के कारण, फिलहाल केवल बड़ी बैलेंस शीट वाली कंपनियां ही इसमें भाग ले पा रही हैं। छोटी और मिड-साइज कंपनियों के लिए यह जोखिम उठाना मुश्किल है। इसके अलावा, 'गारंटीड ऑफटेक एग्रीमेंट' न होने से बैंक भी कर्ज देने में सावधानी बरत रहे हैं, जिससे 2030 तक 100 मिलियन टन गैसीफिकेशन क्षमता हासिल करने का टारगेट मुश्किल में पड़ सकता है।
अब क्या है उम्मीद?
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि केवल सब्सिडी से काम नहीं चलेगा। सरकार को अब 'क्रेडिट-गारंटी मैकेनिज्म' लाने की जरूरत है, ताकि बैंकों का रिस्क कम हो और कंपनियों को सस्ती दरों पर लंबे समय के लिए कर्ज मिल सके। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि कैसे ये कंपनियां अप्रूवल से लेकर फाइनेंशियल क्लोजर तक का सफर तय करती हैं और क्या सरकार की ओर से कोई नई पॉलिसी रिलीफ मिलती है या नहीं।
