सरकार की महत्वाकांक्षी कोल गैसीफिकेशन योजना को बड़ा झटका लगा है। इस स्कीम के तहत कोई भी बोलीदाता (bidder) आगे नहीं आया है, जिससे आयात घटाने की सरकारी रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं।
भारत सरकार की ओर से कोयले को केमिकल फीडस्टॉक में बदलने की बड़ी योजना फिलहाल पटरी से उतरती दिख रही है। ₹37,500 करोड़ के प्रोत्साहन पैकेज (incentive scheme) के लिए जारी किए गए टेंडर में एक भी बिड नहीं आई है। यह पहल उन आयातित रसायनों और यूरिया पर निर्भरता कम करने के लिए थी, जिन पर भारत हर साल ₹2.77 लाख करोड़ से अधिक खर्च करता है।
क्यों फेल हुई यह स्कीम?
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट में कई तकनीकी और आर्थिक पेच हैं। पहली बड़ी चुनौती कोयले से गैस बनाने वाले प्लांट (gasification plants) की भारी-भरकम शुरुआती लागत है। इसके अलावा, भारत में मिलने वाले कोयले में राख (high-ash content) ज्यादा होती है, जिसे प्रोसेस करना तकनीकी रूप से काफी मुश्किल और महंगा काम है।
कंपनियों की चिंताएं क्या हैं?
बड़ी केमिकल और एनर्जी कंपनियों ने सरकार के सामने तीन प्रमुख चिंताएं रखी हैं:
- मार्केट रिस्क: फाइनल प्रोडक्ट के लिए कोई सुनिश्चित खरीदार (assured buyer) न होना।
- सप्लाई की कमी: घरेलू कोयले की सप्लाई और लिंकेज को लेकर स्पष्टता का अभाव।
- ऑपरेशनल चुनौतियां: क्लीन कोयले के मुकाबले भारतीय कोयले की प्रोसेसिंग की जटिलता।
फिलहाल, सरकार का फोकस ₹8,500 करोड़ वाली एक अलग छोटी योजना पर है, जो आठ मौजूदा प्रोजेक्ट्स को सपोर्ट कर रही है। अब सबकी नजरें कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) पर टिकी हैं कि क्या सरकार इस स्कीम के नियमों में बदलाव करेगी या सब्सिडी के ढांचे को फिर से तैयार किया जाएगा ताकि निजी निवेशकों का भरोसा जीता जा सके।
