भारत के कोल गैसीफिकेशन इंसेंटिव स्कीम में Adani Enterprises और NTPC समेत **7** कंपनियों ने आवेदन किए हैं। इस स्कीम का लक्ष्य इंपोर्ट बिल कम करना है, लेकिन भारतीय कोयले में मौजूद अधिक राख (Ash Content) एक बड़ी तकनीकी बाधा बनी हुई है।
कोल मंत्रालय की ₹37,500 करोड़ की सरफेस कोल और लिग्नाइट गैसीफिकेशन स्कीम के पहले राउंड में 7 कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है। इस योजना का उद्देश्य 2030 तक 100 मिलियन टन की गैसीफिकेशन क्षमता हासिल करना है। इस दौड़ में Adani Enterprises यूरिया प्रोजेक्ट्स के साथ, तो NTPC सिंथेटिक नेचुरल गैस पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इनके अलावा Talcher Fertilisers, Gallantt Ispat और Shyam Sel & Power जैसी कंपनियों ने भी दावेदारी पेश की है।
इंपोर्ट पर भारी निर्भरता
भारत का मकसद LNG, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल के आयात पर निर्भरता घटाना है। फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में इन चीजों के आयात पर देश ने लगभग ₹2.77 लाख करोड़ खर्च किए। सरकार का अनुमान है कि स्थानीय उत्पादन से देश में ₹2.5 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ तक का निवेश आ सकता है।
असली चुनौती: भारतीय कोयले की 'राख'
प्रोजेक्ट्स की सफलता के सामने सबसे बड़ी बाधा तकनीकी है। भारतीय कोयले में 30-45% तक राख (Ash) होती है, जो वैश्विक मानकों से काफी अधिक है। विदेशी टेक्नोलॉजी, जिसे कम राख वाले कोयले के लिए बनाया गया है, उसे भारत में सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन के पास भले ही 60 साल का अनुभव हो, लेकिन वहां की टेक्नोलॉजी को भारतीय कोयले के अनुकूल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग बदलाव करने होंगे।
आगे का रास्ता
ये प्रोजेक्ट्स बहुत ज्यादा कैपिटल-इंटेंसिव हैं। कंपनी के शेयरों पर नजर रखने वाले निवेशकों को यह देखना होगा कि कैसे कंपनियां ऑपरेशनल लागत को मैनेज करती हैं। सरकार ने 8 सितंबर, 2026 से आवेदन का दूसरा दौर शुरू कर दिया है और अगले कुछ महीनों में यह प्रक्रिया और तेज होने की उम्मीद है।
