सरकार की महत्वाकांक्षी ₹18,100 करोड़ की बैटरी PLI स्कीम संकट में फंसी है। 50 GWh के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 2 GWh से भी कम कैपेसिटी हासिल हो पाई है, जिससे Reliance और Ola Electric जैसी कंपनियों की राह कठिन हो गई है।
भारत के एडवांस्ड बैटरी मैन्युफैक्चरिंग हब बनने के सपने को बड़ा झटका लगा है। साल 2021 में शुरू हुई इस PLI स्कीम का उद्देश्य ₹18,100 करोड़ के प्रोत्साहन के जरिए 50 GWh की लोकल प्रोडक्शन कैपेसिटी तैयार करना था। लेकिन ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं; अभी 2 GWh से भी कम कैपेसिटी चालू हो पाई है।\n\n### किन कंपनियों पर है नजर?\n\nइस स्कीम में Reliance Industries, Ola Electric और Rajesh Exports की सब्सिडियरी ACC Energy Storage जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। भारी निवेश और सरकारी मदद के बावजूद, मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने में कंपनियां पसीना बहा रही हैं। बुनियादी ढांचे की कमी और बैटरी बनाने की विशेष तकनीकी विशेषज्ञता (specialized manufacturing expertise) न होना सबसे बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।\n\n### क्यों आ रही है रुकावट?\n\nसबसे बड़ी समस्या कच्चे माल (raw materials) के लिए विदेशी निर्भरता है। एनोड और कैथोड जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए आज भी कंपनियां दूसरे देशों पर निर्भर हैं। साथ ही, चीन से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर लगी पाबंदियों के कारण नई तकनीकों को अपनाना मुश्किल हो गया है। जब तक भारत में मैटेरियल साइंस में कोई बड़ा ब्रेकथ्रू नहीं मिलता, तब तक मास-स्केल मैन्युफैक्चरिंग की राह आसान नहीं होगी।\n\n### निवेशकों के लिए जोखिम\n\nबैटरी प्लांट जैसे प्रोजेक्ट्स में भारी-भरकम कैपिटल खर्च (CAPEX) लगता है। यदि कैपेसिटी समय पर तैयार नहीं होती, तो कंपनियों के कैश फ्लो और प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ता है। बाजार अब इस बात पर नजर रखे हुए है कि सरकार क्या स्कीम में कोई बदलाव करती है या कंपनियां अपनी स्वतंत्र टेक्नोलॉजी खोजने में कितनी सफल रहती हैं। आने वाले समय में प्रोडक्शन लाइन्स की कमिशनिंग में देरी सेक्टर के लिए एक बड़ा 'रेड फ्लैग' हो सकती है।
