भारत का विंड एनर्जी सेक्टर अगले फाइनेंशियल ईयर 2026-27 में 8 गीगावाट (GW) नई क्षमता जोड़ने की तैयारी में है। यह लक्ष्य पिछले साल के रिकॉर्ड 6.1 GW इंस्टॉलेशन के बाद आया है। सरकार अब पुरानी टर्बाइनों को बदलने (Repowering) और ऑफशोर प्रोजेक्ट्स पर जोर दे रही है ताकि 2030 तक 100 GW का बड़ा टारगेट पूरा किया जा सके।
क्यों हो रहा है ये बड़ा बदलाव?
केंद्रीय नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने हाल ही में इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि विंड एनर्जी भारत की ग्रिड को स्थिर रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। 2030 तक 100 GW का लक्ष्य हासिल करने के लिए, सरकार दो मुख्य मोर्चों पर काम कर रही है: पहला, पुरानी विंड प्रोजेक्ट्स को 'रिपॉवर' करना और दूसरा, ऑफशोर (समुद्र किनारे) विंड एनर्जी का विकास करना। मंत्रालय ने इंडस्ट्री से 30 दिनों के अंदर रिपॉवरिंग प्रक्रिया में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए एक विस्तृत प्लान मांगा है।
'रिपॉवरिंग' की अहमियत
'रिपॉवरिंग' इंडस्ट्री के लिए एक बेहद जरूरी रणनीति है। कई विंड फार्म जो एक दशक से भी पहले लगाए गए थे, उनमें पुरानी, छोटी टर्बाइनें लगी हैं जिनकी क्षमता 1 मेगावाट (MW) से भी कम है। इन जगहों पर पहले से ही ग्रिड कनेक्शन और जमीन उपलब्ध है, जो नए प्रोजेक्ट लगाने में सबसे बड़ी मुश्किलें होती हैं।
पुरानी, कम क्षमता वाली टर्बाइनों को हटाकर आधुनिक, हाई-एफिशिएंसी वाली टर्बाइनों (जो 3 MW या उससे ज्यादा पावर जेनरेट कर सकती हैं) को लगाने से, बिना नई जमीन अधिग्रहित किए बिजली उत्पादन में भारी बढ़ोतरी की जा सकती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में कुछ चुनौतियां हैं। निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि पावर परचेज एग्रीमेंट (PPAs) और मौजूदा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से जुड़े मुद्दों को सुलझाना होगा, तभी कंपनियां बड़े पैमाने पर इन अपग्रेड्स को लागू कर पाएंगी।
मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट में बूम
भारत में विंड टर्बाइन मैन्युफैक्चरिंग में गजब की तेजी देखी गई है। 2014 में जहां कुल क्षमता 10 GW थी, वहीं आज यह 24 GW तक पहुंच गई है। इस विस्तार ने न सिर्फ डोमेस्टिक डिमांड को पूरा किया है, बल्कि भारत को एक एक्सपोर्ट हब भी बनाया है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में, भारत ने ₹12,000 करोड़ के विंड टर्बाइन और कंपोनेंट्स का एक्सपोर्ट किया, जो पिछले साल की तुलना में 50% ज्यादा है। सुजलॉन एनर्जी (Suzlon Energy) और इनॉक्स विंड (Inox Wind) जैसी लिस्टेड कंपनियां इस ग्रोथ का फायदा उठा रही हैं।
सेक्टर में जोखिम और चुनौतियां
भविष्य का अनुमान भले ही सकारात्मक हो, लेकिन इस सेक्टर में कुछ संरचनात्मक जोखिम भी हैं। जमीन अधिग्रहण एक जटिल प्रक्रिया है, जिससे प्रोजेक्ट शुरू होने में देरी हो सकती है। इसके अलावा, ऑफशोर विंड प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत होती है और ये ऑनशोर प्रोजेक्ट्स की तुलना में तकनीकी रूप से ज्यादा जोखिम भरे होते हैं। पुरानी पावर डील्स के पुनर्निवगोशिएशन (renegotiation) का रेगुलेटरी जोखिम भी है, जो इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स (IPPs) के मुनाफे पर असर डाल सकता है। निवेशकों को यह ध्यान रखना होगा कि क्षमता जोड़ने की असली रफ्तार पॉलिसी और एग्जीक्यूशन की बाधाओं को कितनी जल्दी दूर किया जाता है, इस पर निर्भर करेगी।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
भविष्य में, निवेशकों के लिए मुख्य बातें होंगी - तमिलनाडु में ऑफशोर पायलट प्रोजेक्ट की प्रगति और रिपॉवरिंग के लिए घोषित की जाने वाली नई पॉलिसी। मैन्युफैक्चरर्स के लिए, ऑर्डर बुक का आकार और एक्सपोर्ट मार्जिन की स्थिरता महत्वपूर्ण संकेतक होंगे। ग्रिड कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि नए विंड फार्म से बिजली को कंजम्पशन सेंटर्स तक पहुंचाने की क्षमता इन प्रोजेक्ट्स की दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।
