भारत में बिजली की मांग में तेजी के चलते थर्मल पावर प्लांट का उपयोग बढ़कर **70.2%** पर पहुंच गया है। रिन्यूएबल एनर्जी के विस्तार के बावजूद, ग्रिड की स्थिरता और पीक आवर्स की जरूरतों के लिए थर्मल पावर आज भी एक भरोसेमंद आधार बनी हुई है।
भारत की बढ़ती बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए थर्मल पावर प्लांट साल 2026 में पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं। अप्रैल से अगस्त के बीच इनकी कैपेसिटी यूटिलाइजेशन दर बढ़कर 70.2% हो गई है, जो पिछले साल इसी अवधि में 66.3% थी। कोयला आधारित बिजली उत्पादन में अगस्त के महीने में 11.7% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो लगातार तीसरा महीना है जब इसमें डबल-डिजिट ग्रोथ देखी गई है।
क्यों कम नहीं हो रही थर्मल की जरूरत?
एनर्जी सेक्टर की हकीकत यह है कि सोलर और विंड एनर्जी का तेजी से विस्तार तो हो रहा है, लेकिन वे अभी अकेले पूरे लोड का भार उठाने में सक्षम नहीं हैं। सोलर पावर की उपलब्धता सूर्यास्त के बाद गिर जाती है, ठीक उसी वक्त शाम को बिजली की मांग अपने पीक पर होती है। ऐसे में थर्मल पावर प्लांट ही ग्रिड को 24x7 स्थिर रखने का काम कर रहे हैं।
नए कॉन्ट्रैक्ट्स और भविष्य की योजनाएं
कंपनियां एक तरफ रिन्यूएबल टारगेट पूरा करने में जुटी हैं, तो दूसरी तरफ थर्मल प्रोजेक्ट्स के लिए लंबे समय के पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) भी हासिल कर रही हैं। हाल ही में करीब 22,000 से 23,000 मेगावाट की नई थर्मल कैपेसिटी के कॉन्ट्रैक्ट्स दिए गए हैं। 'सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी' का अनुमान है कि रिन्यूएबल ग्रोथ के साथ ग्रिड को स्टेबल रखने के लिए अगले एक दशक में भारत को अतिरिक्त 85,000 मेगावाट थर्मल कैपेसिटी की जरूरत होगी।
रेगुलेटरी चुनौतियां
फिलहाल, रेगुलेटरी मोर्चे पर एक बड़ा विवाद चल रहा है। थर्मल प्लांट की न्यूनतम ऑपरेटिंग रिक्वायरमेंट को 55% से घटाकर 40% करने का प्रस्ताव है, जिस पर इंडस्ट्री को चिंता है कि इससे मशीनों की सेहत और दक्षता पर बुरा असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
NTPC और JSW Energy जैसी कंपनियां अपने पोर्टफोलियो को बैलेंस कर रही हैं। शेयरधारकों के लिए सबसे जरूरी यह देखना है कि कंपनियां कैसे नई कैपेसिटी को कमीशन करती हैं और भविष्य में बदलती पर्यावरण नीतियों के बीच अपने पुराने प्लांट्स को कैसे मैनेज करती हैं।
