सोलर एनर्जी में आत्मनिर्भरता की ओर
भारत अपनी सोलर एनर्जी वैल्यू चेन को मजबूत करने में जुट गया है। देश सोलर मॉड्यूल असेंबली में पहले से ही एक बड़ी शक्ति है, जिसकी क्षमता FY26 तक 172 GW से अधिक हो जाएगी। लेकिन, सोलर सेल, वेफर और इंगट जैसे अपस्ट्रीम सेगमेंट में अभी भी चुनौतियां हैं। हालिया इंडस्ट्री एनालिसिस से पता चलता है कि देश घरेलू वेफर और इंगट उत्पादन की ओर बढ़ रहा है, जिसका लक्ष्य वित्तीय वर्ष 2030 के अंत तक 24-33 GW क्षमता तक पहुंचना है। यह बदलाव सिर्फ क्षमता बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि यह भारत की एनर्जी सप्लाई चेन को चीन पर निर्भरता से मुक्त करने और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में आने वाले उतार-चढ़ावों से बचाने के लिए एक सोची-समझी रणनीति है।
भारी भरकम निवेश की जरूरत
इस विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी। अनुमान है कि इस दशक में ₹80,000 करोड़ से अधिक का कैपिटल एक्सपेंडिचर (capital expenditure) होगा। Waaree Energies, Tata Power Renewable Energy और Premier Energies जैसे बड़े घरेलू प्लेयर्स ने पहले ही 10 GW क्षमता विस्तार पर बड़ा निवेश करना शुरू कर दिया है। ये कंपनियां सिर्फ मॉड्यूल असेंबली से आगे बढ़कर वेफर और इंगट मैन्युफैक्चरिंग में उतर रही हैं, जिसमें मॉड्यूल उत्पादन की तुलना में कहीं अधिक तकनीकी सटीकता और पूंजी की आवश्यकता होती है। मॉड्यूल सेगमेंट में जहां मुख्य रूप से हाई-स्पीड ऑटोमेटेड असेंबली होती है, वहीं अपस्ट्रीम प्रोडक्शन के लिए एडवांस्ड इंगट पुलिंग लाइन्स और स्लाइसिंग सुविधाओं की जरूरत होती है, जो ऐतिहासिक रूप से सोलर इंडस्ट्री के सबसे महंगे और टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव हिस्से रहे हैं।
पॉलिसी का दोहरा पहलू
इस तेजी को प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) का सहारा मिल रहा है। हालांकि, यह संरक्षणवादी माहौल कुछ जोखिम भी पैदा करता है। जहां घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को इन ट्रेड बैरियर्स से फायदा हो रहा है, वहीं घरेलू मूल्य वृद्धि डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट डेवलपर्स के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। इसके अलावा, हालिया डेटा बताते हैं कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को वैश्विक स्तर पर दूसरे देशों के मुकाबले अधिक उत्पादन लागत का सामना करना पड़ रहा है। इसका कारण कैपिटल इक्विपमेंट की ऊंची लागत और इंपोर्टेड टेक्नोलॉजी पर निर्भरता है। 2028 से लागू होने वाले इंगट और वेफर के लिए ALMM-III मैंडेट को पूरा करने के लिए कंपनियों को लागत-प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए तेजी से दक्षता में सुधार करना होगा, क्योंकि सरकार आयातित इनपुट पर निर्भरता कम करना चाहती है।
संभावित जोखिम (Bear Case)
बड़े पैमाने पर उत्पादन की आक्रामक कोशिशों में कुछ बड़े स्ट्रक्चरल जोखिम भी छिपे हैं। पहला, सप्लाई चेन की कमजोरी का खतरा है; योजनाबद्ध क्षमता वृद्धि के बावजूद, भारत में पॉलीसिलिकॉन (polysilicon) का घरेलू इकोसिस्टम नहीं है, जिससे मैन्युफैक्चरर्स अभी भी वैश्विक फीडस्टॉक सप्लायर्स पर निर्भर हैं। दूसरा, अगर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता घरेलू प्रोजेक्ट पाइपलाइन से आगे निकल जाती है, तो ओवरसप्लाई का खतरा है, जिससे छोटे, नॉन-इंटीग्रेटेड प्लेयर्स के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, रेगुलेटरी रिस्क (regulatory risk) भी एक लगातार बना रहने वाला खतरा है। इतिहास गवाह है कि बेसिक कस्टम ड्यूटी और ट्रेड-संबंधित टैरिफ में बदलाव से अक्सर मुकदमेबाजी और डेवलपर्स के लिए लागत में वृद्धि हुई है, जिससे अनिश्चितता पैदा हुई है। निवेशकों को 'नेमप्लेट कैपेसिटी' के बजाय वास्तविक 'कैपेसिटी यूटिलाइजेशन' पर ध्यान केंद्रित करना होगा, क्योंकि टेक्नोलॉजी में बदलाव के कारण पिछले मॉड्यूल सुविधाओं में अक्सर कम यूटिलाइजेशन रेट देखा गया है। जो कंपनियां TOPCon जैसी नई सेल टेक्नोलॉजीज में तेजी से बदलाव करने में विफल रहेंगी, वे पुरानी लाइनों के बोझ तले दब सकती हैं जो दक्षता या लागत पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगी।
