India Solar Sector: ALMM List-II के कारण सप्लाई में आई कमी, निवेशक और डेवलपर्स की बढ़ी चिंता

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Solar Sector: ALMM List-II के कारण सप्लाई में आई कमी, निवेशक और डेवलपर्स की बढ़ी चिंता

भारत के सोलर सेक्टर में घरेलू सोलर सेल के इस्तेमाल के नियम से सप्लाई की बड़ी कमी हो गई है। प्रोडक्शन कैपेसिटी डिमांड से पीछे चल रही है। सरकार ने कुछ प्रोजेक्ट्स को 2026 तक राहत दी है, लेकिन डेवलपर्स को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। निवेशक देख रहे हैं कि मैन्युफैक्चरर्स कैसे उत्पादन लक्ष्य और बड़े कैपिटल खर्च के बीच संतुलन बनाते हैं।

क्या है ALMM List-II और क्यों आई सप्लाई में कमी?

भारत का सोलर सेक्टर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, लेकिन नए नियम एक बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। 1 जून 2026 से लागू ALMM List-II के तहत, सोलर प्रोजेक्ट्स में केवल देश में बने सोलर सेल का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। इसका मकसद लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है, लेकिन मौजूदा प्रोडक्शन कैपेसिटी सालाना 30 से 40 GW की मांग को पूरा करने के लिए काफी कम है।

प्रोडक्शन और डिमांड में बड़ा गैप

भारत ने सोलर मॉड्यूल असेंबल करने में तो प्रगति की है, ALMM List-I के तहत अगस्त 2026 तक 217 GW से ज्यादा की कैपेसिटी रजिस्टर है। लेकिन, सोलर सेल बनाने का काम अभी भी शुरुआती दौर में है। कुल मॉड्यूल असेंबली कैपेसिटी और स्थानीय रूप से उत्पादित सेल्स की मात्रा के बीच बड़ा अंतर है, जिससे डेवलपर्स को अपने प्रोजेक्ट्स के लिए ज़रूरी सामान जुटाने में दिक्कत आ रही है।

सरकार की राहत और आगे की राह

इंडस्ट्री को एडजस्ट करने में मदद के लिए, न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी मिनिस्ट्री ने खास राहत दी है। नेट-मीटरिंग और ओपन-एक्सेस सोलर प्रोजेक्ट्स को इन नए नियमों का पालन करने के लिए 31 दिसंबर 2026 तक का समय दिया गया है। हालांकि, सरकार सभी प्रोजेक्ट्स के लिए कोई बड़ी एक्सटेंशन देने के मूड में नहीं है, जो डोमेस्टिक प्रोडक्शन को प्राथमिकता देने का साफ संकेत देता है।

निवेशकों के लिए क्या है मायने?

यह स्थिति निवेशकों के लिए इस बदलाव की कैपिटल-इंटेंसिव प्रकृति को उजागर करती है। सोलर सेल और वेफर बनाने के लिए खास इक्विपमेंट और टेक्नोलॉजी में भारी निवेश की ज़रूरत होती है। कंपनियां इन प्रोडक्शन लाइन्स में पैसा लगा रही हैं, जिसमें एग्जीक्यूशन रिस्क भी शामिल है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मैन्युफैक्चरर्स अपने प्लांट्स को ठीक से कैसे चलाते हैं, प्रोडक्शन को स्थिर करते हैं और बड़े विस्तार प्रोजेक्ट्स से जुड़े कर्ज को कैसे मैनेज करते हैं। निवेशकों को प्लान की गई कैपेसिटी के बजाय, इन नई सुविधाओं से आने वाले असली आउटपुट नंबर्स पर नज़र रखनी चाहिए।

प्रोजेक्ट लागत और मार्केट पर असर

इस कमी का प्रोजेक्ट की लागत पर भी सीधा असर पड़ रहा है। कंप्लायंट मॉड्यूल्स की मौजूदा शॉर्टेज के कारण कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, जिससे सोलर डेवलपर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ रहा है। अगर यह सप्लाई क्रंच जारी रहता है, तो प्रोजेक्ट में देरी हो सकती है, क्योंकि डेवलपर्स को सही कीमत पर मैटेरियल सोर्स करने में मुश्किल होगी। पॉलिसी की लॉन्ग-टर्म सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डोमेस्टिक प्रोडक्शन कीमतों को स्थिर करने के लिए कितनी तेज़ी से स्केल-अप कर पाती है।

आगे क्या देखना होगा?

सेक्टर के लिए मुख्य बात यह होगी कि नए सेल मैन्युफैक्चरिंग लाइन्स कितनी जल्दी पूरी तरह से ऑपरेशनल होती हैं। मार्केट किसी भी नए टेंडर की ज़रूरतों और डेवलपर्स की क्षमता पर भी ध्यान देगा कि वे प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल वायबिलिटी से समझौता किए बिना, बढ़ी हुई मॉड्यूल लागतों को कैसे मैनेज करते हैं। डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट करने और ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन की स्पीड बनाए रखने के बीच का संतुलन मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर बना रहेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.