भारत में सौर ऊर्जा की बर्बादी मई महीने में **747 GWhr** के पार पहुंच गई है। वजह साफ है - पीक आवर्स (Peak Hours) में सप्लाई, ग्रिड की क्षमता से ज्यादा हो गई। यह बढ़ती समस्या डेवलपर्स के प्रोजेक्ट रिटर्न (Project Returns) पर असर डाल सकती है और ग्रिड अपग्रेड (Grid Upgrade) का दबाव बढ़ा सकती है।
ग्रिड फेल, लाखों यूनिट बिजली की बर्बादी!
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) सेक्टर इस समय एक बड़ी चुनौती से जूझ रहा है। मई महीने में, जब सूरज की रोशनी सबसे तेज़ होती है, उस दौरान सौर ऊर्जा का उत्पादन ग्रिड की मांग से कहीं ज़्यादा हो गया। इस वजह से, ग्रिड को स्थिर रखने के लिए ज़्यादातर सौर बिजली को जानबूझकर छोड़ना पड़ा या बर्बाद करना पड़ा। अप्रैल में यह बर्बादी 677 GWhr थी, जो मई में बढ़कर 747 GWhr हो गई। यह इतनी ज़्यादा बिजली है कि हर दिन एक 1,000 MW के पावर प्लांट से जितनी बिजली बनती है, उतनी बर्बाद हो रही है।
इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) की कमी और क्षमता की बाधा
यह स्थिति दिखाती है कि जहां भारत तेज़ी से सोलर पावर प्लांट लगा रहा है, वहीं ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे पावर इवैक्यूएशन सिस्टम (Power Evacuation System) और एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) समाधान, उतनी तेज़ी से विकसित नहीं हो पा रहे हैं। इस कमी के चलते, जब सूरज की रोशनी अपने चरम पर होती है, तो ग्रिड उस अतिरिक्त बिजली को संभाल नहीं पाता और नतीजतन, साफ ऊर्जा बर्बाद हो जाती है।
स्टोरेज (Storage) के आर्थिक पहलू
प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल (Economic Advisory Council) की हालिया रिपोर्ट भी इस पेचीदा मामले पर रोशनी डालती है। एनर्जी स्टोरेज की ज़रूरत तो है, लेकिन इसके बड़े पैमाने पर निर्माण की लागत, बचाई गई ऊर्जा के मूल्य से कहीं ज़्यादा हो सकती है। फिलहाल, भारत के पास लगभग 2.7 GW की स्टोरेज क्षमता है, जबकि लक्ष्य 8.68 GW का है। हालांकि, इंडस्ट्री अब ऐसे प्रोजेक्ट्स पर ध्यान दे रही है जिनमें स्टोरेज की ज़रूरत शामिल हो, ताकि भविष्य में होने वाली बर्बादी को कम किया जा सके।
मांग प्रबंधन (Demand Management) और ग्रिड की फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility)
सिर्फ स्टोरेज बढ़ाने के अलावा, बिजली की मांग को मैनेज करना भी एक बड़ा फैक्टर है। एग्रीकल्चरल लोड शिफ्टिंग (Agricultural Load Shifting) जैसे प्रोग्राम, यानी खेती के लिए बिजली का इस्तेमाल तब करना जब सौर ऊर्जा उपलब्ध हो, या टाइम-ऑफ़-डे टैरिफ (Time-of-Day Tariff) लागू करना, लोड को बैलेंस करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन, स्मार्ट मीटर (Smart Meter) का इंस्टॉलेशन उम्मीद से धीमा है, जिसके बिना डिमांड-रिस्पॉन्स प्रोग्राम (Demand-Response Program) को पूरे देश में लागू करना मुश्किल है।
निवेशकों के लिए, ग्रिड इंटीग्रेशन (Grid Integration) की रफ़्तार और स्टोरेज-लिंक्ड टेंडर्स (Storage-linked tenders) का अपनाना महत्वपूर्ण होगा। सोलर डेवलपर्स (Solar Developers) का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे नॉन-पीक आवर्स (Non-peak hours) में बिजली सप्लाई कर पाते हैं या नहीं। साथ ही, ट्रांसमिशन एक्सेस (Transmission Access) और रीजनल या इंटरनेशनल ग्रिड कनेक्शन (Regional or International Grid Connections) से जुड़े पॉलिसी बदलावों पर भी नज़र रखनी होगी।
