भारत की सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता अगस्त 2026 तक **200 GW** से ऊपर पहुंच गई है, जो पिछले कुछ सालों के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है। हालांकि, सेक्टर अभी भी पॉलीसिलिकॉन जैसे जरूरी कच्चे माल के लिए **100%** आयात पर निर्भर है। यह कमी सप्लाई चेन के जोखिम और लागत का दबाव बढ़ाती है, जिसे सरकार नई इंसेंटिव स्कीम्स से दूर करना चाहती है।
भारत की सोलर इंडस्ट्री में बड़ा मुकाम
भारत के सोलर एनर्जी सेक्टर ने अगस्त 2026 तक एक अहम पड़ाव पार कर लिया है, जहां सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 200 गीगावाट (GW) के पार निकल गई है। कुछ साल पहले जब देश में डोमेस्टिक प्रोडक्शन क्षमता बहुत कम थी, तब से यह एक बड़ा कदम है। देश की कुल इंस्टॉल्ड सोलर पावर करीब 164.59 GW तक पहुंच गई है, जो रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ भारत के आक्रामक रुख और फॉसिल फ्यूल से दूरी बनाने को दर्शाता है।
बड़ी चुनौती: आयात पर निर्भरता
हालांकि, इस बढ़ती असेंबली क्षमता के पीछे एक बड़ी चुनौती छिपी है। जहां भारत अब बड़ी मात्रा में सोलर मॉड्यूल असेंबल कर सकता है, वहीं सोलर सेल बनाने के लिए जरूरी पॉलीसिलिकॉन जैसे कच्चे माल के लिए देश पूरी तरह आयात पर निर्भर है। इसके अलावा, वेफर्स (Wafers) और इंगॉट्स (Ingots) के लिए भी बड़ा हिस्सा दूसरे देशों, खासकर चीन से आता है। इसकी वजह से एक स्ट्रक्चरल गैप बन गया है, जहां डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स सिर्फ असेंबली हब बनकर रह गए हैं, न कि इंटीग्रेटेड प्रोड्यूसर्स। वे ग्लोबल कीमतों में उतार-चढ़ाव, शिपिंग में देरी और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति संवेदनशील हो गए हैं।
सरकार की नई पहल
इस गैप को भरने के लिए सरकार ने Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) जैसी नीतियां पेश की हैं, जिसके तहत सोलर प्रोजेक्ट्स को डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्ड सेल का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। सरकार पॉलीसिलिकॉन के लोकल प्रोडक्शन को बढ़ावा देने के लिए एक नई इंसेंटिव स्कीम की भी योजना बना रही है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 30 GW क्षमता हासिल करना है। इस इनिशिएटिव में करीब ₹25,000 करोड़ के निवेश की उम्मीद है, ताकि इंडस्ट्री को साधारण असेंबली से आगे बढ़ाकर बैकवर्ड इंटीग्रेशन की ओर ले जाया जा सके।
आगे का रास्ता: जोखिम और मौके
सोलर इंडस्ट्री के लिए यह बदलाव जहां मौके लेकर आया है, वहीं जोखिम भी खड़े किए हैं। इंपोर्टेड अपस्ट्रीम मटेरियल पर निर्भरता का मतलब है कि अगर पॉलीसिलिकॉन या वेफर्स की ग्लोबल कीमतें बढ़ीं, तो डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, नई इंसेंटिव स्कीम्स के लागू होने में देरी का भी जोखिम है, जो लोकल मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ने की गति को धीमा कर सकता है। निवेशकों और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां कितनी तेजी से डोमेस्टिक पॉलीसिलिकॉन और वेफर प्रोडक्शन फैसिलिटीज़ स्थापित कर पाती हैं, ताकि वे विदेशी सप्लायर्स पर अपनी निर्भरता कम कर सकें।
खास बातें जिन पर नजर रखनी होगी
आने वाले महीनों में 30 GW पॉलीसिलिकॉन इंसेंटिव स्कीम की प्रगति और डोमेस्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता (जो फिलहाल करीब 32 GW है) का बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तेजी से स्केल-अप होना, ये कुछ ऐसी चीजें हैं जिन पर नजर रखनी होगी। इन क्षेत्रों में सफलता यह तय करेगी कि भारतीय सोलर मैन्युफैक्चरर्स अपनी ग्रोथ को बनाए रख पाते हैं या नहीं और ग्लोबल सप्लाई चेन के जोखिमों से अपने प्रॉफिट को बचा पाते हैं या नहीं।
