भारत में सोलर एनर्जी का भविष्य अब बड़े प्रोजेक्ट्स की जगह छोटे, डिसेंट्रलाइज्ड (Decentralized) प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 में अब तक जोड़े गए सोलर कैपेसिटी (Capacity) में से 40% ऐसे ही छोटे प्रोजेक्ट्स, जैसे रूफटॉप सोलर और KUSUM योजना से आए हैं, जो पिछले साल सिर्फ 22% थे। ग्रिड की कमी और पावर ट्रांसमिशन में देरी इन बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ा सिरदर्द बन गई है।
क्या है भारत का नया सोलर प्लान?
भारत में रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। चालू फाइनेंशियल ईयर 2027 के पहले चार महीनों में, डिसेंट्रलाइज्ड सोलर प्रोजेक्ट्स, खासकर रूफटॉप इंस्टॉलेशन (Rooftop Installation) और प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (KUSUM) योजना, ने कुल नई सोलर कैपेसिटी का 40% हिस्सा जोड़ा है। यह पिछले वित्तीय वर्ष के 22% के मुकाबले एक भारी उछाल है, जो साफ दर्शाता है कि अब फोकस बड़े पैमाने की परियोजनाओं से हटकर छोटे स्तर की ऊर्जा उत्पादन पर जा रहा है।
ग्रिड की समस्या कैसे बनी वजह?
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह सिर्फ ग्राहकों की बढ़ती मांग नहीं, बल्कि भारत के पावर ग्रिड (Power Grid) में आ रही एक गंभीर रुकावट है। बड़े यूटिलिटी-स्केल सोलर प्रोजेक्ट्स को बिजली ग्रिड से जोड़ना एक बड़ी चुनौती बन गया है। असल में, इन परियोजनाओं के निर्माण के समय में और ट्रांसमिशन लाइनों (Transmission Lines) के निर्माण के समय में एक बड़ा अंतर है। जहां एक सोलर प्लांट 12 से 18 महीनों में तैयार हो सकता है, वहीं उस बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने के लिए जरूरी ट्रांसमिशन लाइनें बनाने में 36 से 60 महीने तक लग जाते हैं।
बड़े डेवलपर्स के लिए बढ़ा जोखिम
इस देरी के कारण बड़े प्रोजेक्ट डेवलपर्स (Developers) के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। कई बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स को फिलहाल बिजली सप्लाई करने के लिए सिर्फ अस्थायी (Temporary) ग्रिड एक्सेस की मंजूरी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इसके चलते पावर इवैक्यूएशन (Power Evacuation) यानी बिजली को ग्रिड तक भेजने में गंभीर समस्याएं आ रही हैं। कुछ जगहों पर, ऐसे प्रोजेक्ट्स को पीक सनलाइट के घंटों के दौरान 30% से 50% तक बिजली कटौती झेलनी पड़ रही है। इससे निवेशकों के लिए सीधा फाइनेंशियल रिस्क (Financial Risk) पैदा हो गया है, क्योंकि उन्हें प्लांट की पूरी क्षमता के मुकाबले काफी कम कमाई हो रही है।
डिसेंट्रलाइज्ड एनर्जी की ओर बढ़ता कदम
इसी को देखते हुए, सरकार और इंडस्ट्री अब डिसेंट्रलाइज्ड एनर्जी की ओर रुख कर रही है। 'पीएम सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना' जैसी पहलें 10 मिलियन (1 करोड़) घरों में रूफटॉप सिस्टम लगाने का लक्ष्य रखती हैं, जिससे लंबी दूरी के ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) की जरूरतें कम हो जाती हैं। बिजली को उत्पादन स्थल पर ही इस्तेमाल करने से ये प्रोजेक्ट्स ग्रिड की उन बाधाओं से बच जाते हैं जो बड़े प्रोजेक्ट्स को सीमित कर रही हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
सेक्टर पर नजर रखने वालों के लिए, अब सिर्फ कुल जोड़ी गई कैपेसिटी नहीं, बल्कि ग्रिड कनेक्टिविटी की गुणवत्ता (Quality) पर ध्यान देना होगा। निवेशक उन कंपनियों की ओर आकर्षित हो सकते हैं जिन्होंने स्थायी (Permanent), लंबी अवधि की ग्रिड एक्सेस हासिल की हो, न कि वे जो अस्थायी नेटवर्क पर निर्भर हैं। इसके अलावा, ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने में सरकार की तेजी यह तय करेगी कि बड़े यूटिलिटी-स्केल प्रोजेक्ट्स कब बिना किसी बिजली कटौती के जोखिम के अपनी पूरी क्षमता से काम कर पाएंगे।
