भारत का तेल आयात: नई रणनीति और बढ़ते जोखिम
भू-राजनीतिक उथल-पुथल और पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच, भारत ने फरवरी में सऊदी अरब से रिकॉर्ड 10.5 लाख बैरल प्रति दिन (bpd) कच्चे तेल का आयात किया है। यह एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है, क्योंकि भारत रूसी तेल की खरीद में लगातार कमी ला रहा है। इस बीच, मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक तेल कीमतों को भड़का रहा है। ब्रेंट क्रूड $79 प्रति बैरल के पार निकल गया है, जबकि WTI फ्यूचर्स $72 प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है। इन चिंताओं को उस घटना ने और बढ़ा दिया जब 2 मार्च, 2026 को सऊदी अरामको की रास तानुरा रिफाइनरी पर हमला हुआ, जिससे क्षेत्र के महत्वपूर्ण ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर की नाजुकता उजागर हुई।
हॉरमूज जलडमरूमध्य का बढ़ता महत्व और खतरा
सऊदी अरब और यूएई जैसे मध्य पूर्वी देशों पर भारत की बढ़ती निर्भरता देश को बड़े भू-राजनीतिक जोखिमों के केंद्र में ला खड़ी करती है। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 2.5-2.7 मिलियन bpd सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई से आता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा हॉरमूज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% संभालता है। ईरान द्वारा बढ़ाए गए तनाव और चेतावनियों के कारण इस जलमार्ग का बाधित होना समुद्री यातायात को थाम सकता है और कीमतों में भारी अस्थिरता ला सकता है। 2024 में, भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 37% थी, जबकि सऊदी अरब की केवल 10%। फरवरी का यह रिकॉर्ड आयात इस प्रवृत्ति का उलट है, जिससे भारत की फारस की खाड़ी से उत्पन्न होने वाली आपूर्ति श्रृंखला में संभावित व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ गई है। नोमुरा (Nomura) जैसे विश्लेषकों का मानना है कि तेल की कीमतों में 10% की वृद्धि भारत के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को और खराब करती है। देश अपनी लगभग 90% कच्चे तेल की जरूरतों का आयात करता है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा एक सर्वोपरि चिंता है।
आर्थिक प्रभाव और सीमित सुरक्षा कवच
भारत की यह नई रणनीति, हालांकि रूसी तेल की कमी को पूरा करने में सहायक है, लेकिन यह देश को मध्य पूर्व के अस्थिर क्षेत्र के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। हॉरमूज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है, भारत के आयात का एक बड़ा हिस्सा भी पार कराता है। रास तानुरा रिफाइनरी पर हालिया ड्रोन हमला इस क्षेत्र में ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर के भौतिक खतरों की एक गंभीर याद दिलाता है। भारत के पास लगभग 10-15 दिनों के रिफाइनरी इन्वेंट्री और 7-10 दिनों के ईंधन स्टॉक के बराबर तेल भंडार है, लेकिन यह हॉरमूज से किसी भी लंबी और गंभीर आपूर्ति व्यवधान से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी से भारत का वार्षिक आयात बिल $13-14 बिलियन बढ़ जाएगा, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ने और रुपये के कमजोर होने का खतरा है। इसके अलावा, ऊंचे माल भाड़े (freight costs) और बीमा प्रीमियम (insurance premiums) से भी आर्थिक बोझ बढ़ता है।
भविष्य की राह: विविधीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा
बाजार के अनुमानों के अनुसार, तेल की कीमतों में अस्थिरता जारी रहने की उम्मीद है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, ब्रेंट क्रूड इस तिमाही के अंत तक $80.77 प्रति बैरल और 12 महीनों में $88.47 तक पहुंच सकता है। जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च (J.P. Morgan Global Research) 2026 के लिए $60/bbl का औसत अनुमान लगाता है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिमों को एक बड़ा अनिश्चितता कारक मानता है। भारत के लिए, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण (diversification) एक रणनीतिक अनिवार्यता बनी हुई है। देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में, नवीकरणीय ऊर्जा (renewables) और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों (clean technologies) का तेजी से विस्तार न केवल एक पर्यावरणीय लक्ष्य, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है।