SHANTI Act: न्यूक्लियर लायबिलिटी में बड़ा बदलाव
हाल ही में लागू हुआ भारत का SHANTI Act न्यूक्लियर इन्वेस्टमेंट के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो रहा है। यह कानून, जो दिसंबर 2025 में पास हुआ, देश के न्यूक्लियर लायबिलिटी नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करता है। इसने विदेशी कंपनियों के लिए लंबे समय से चली आ रही मुश्किलों को दूर किया है। पुराने 2010 के कानून के तहत सप्लायर्स पर भारी बोझ पड़ता था, लेकिन SHANTI Act अब मुख्य लायबिलिटी ऑपरेटर पर डालता है और सप्लायर्स की जिम्मेदारी को सीमित करता है। साथ ही, न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स में 49% तक फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) की इजाजत ने इसे विदेशी कंपनियों और निवेशकों के लिए कहीं ज्यादा आकर्षक बना दिया है।
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) पर खास फोकस
भारत और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के बीच स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) पर खास चर्चा हो रही है। SMRs ज्यादा फ्लेक्सिबल हैं और इनमें लागत कम आने की उम्मीद है, जिससे ये भविष्य की न्यूक्लियर पावर का अहम हिस्सा बनने वाले हैं। 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर क्षमता के भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए SMRs जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज़ ज़रूरी हैं। SHANTI Act से SMRs के विकास और टेक्नोलॉजी शेयरिंग में तेज़ी आने की उम्मीद है। ग्लोबल न्यूक्लियर मार्केट में भी तेज़ी देखी जा रही है, खासकर एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में।
प्रमुख कंपनियां और उनकी स्थिति
इस पॉलिसी बदलाव से भारत की बड़ी कंपनियों के लिए बड़े अवसर खुले हैं। इंजीनियरिंग क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Larsen & Toubro (L&T), जिसकी मार्केट कैप ₹5.42 ट्रिलियन है और P/E लगभग ~33.6 है, पहले से ही रिएक्टर के अहम पुर्ज़े बना रही है। वहीं, Adani Enterprises, जिसकी मार्केट कैप लगभग ₹3.5 ट्रिलियन है और P/E 32.7-35.9 के बीच है, भी एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। Bharat Heavy Electricals Limited (BHEL) जैसी कंपनियां भी भारत के न्यूक्लियर ग्रोथ के लिए महत्वपूर्ण हैं। L&T और Adani के मौजूदा वैल्यूएशन्स, भारत के औद्योगिक भविष्य में निवेशकों के भरोसे को दर्शाते हैं।
सुधारों के बावजूद चुनौतियां बरकरार
सुधारों के बावजूद, इन नीतियों को ज़मीनी हकीकत में बदलने में कई चुनौतियां हैं। नीतियों को प्रोजेक्ट्स में बदलने के लिए कुशल एग्जीक्यूशन, रेगुलेटरी तेज़ी, मज़बूत संस्थागत क्षमताएं और स्पष्ट फाइनेंसिंग प्लान्स ज़रूरी होंगे। न्यूक्लियर पावर को सस्ती सोलर और विंड एनर्जी से कड़ी टक्कर मिल रही है। लंबे कंस्ट्रक्शन टाइम भी एग्जीक्यूशन जोखिम बढ़ाते हैं। हालांकि SHANTI Act अंतरराष्ट्रीय लायबिलिटी नियमों के अनुरूप है, लेकिन पब्लिक का भरोसा बनाए रखने के लिए मज़बूत सेफ्टी ओवरसाइट और डिस्प्यूट रेज़ोल्यूशन की ज़रूरत होगी। भू-राजनीतिक मुद्दे, जैसे कि Nuclear Suppliers Group (NSG) से भारत का पुराना बहिष्कार, भी जटिलताएं पैदा करते हैं।
भारत का महत्वाकांक्षी न्यूक्लियर भविष्य
भारत का लक्ष्य 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर क्षमता हासिल करना है, जो वर्तमान की लगभग 9 GW क्षमता से काफी ज़्यादा है। इस विस्तार के लिए ज़रूरी प्राइवेट और फॉरेन कैपिटल जुटाने में SHANTI Act एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जैसे-जैसे ग्लोबल एनर्जी सिक्योरिटी और नेट-जीरो टारगेट पर ज़ोर बढ़ रहा है, न्यूक्लियर एनर्जी एक रिलाएबल, लो-कार्बन विकल्प के तौर पर फिर से चर्चा में है। भारत के लेजिस्लेटिव सुधार और SMRs पर फोकस इसे न्यूक्लियर एनर्जी के भविष्य में एक प्रमुख खिलाड़ी बनने की राह पर ले जा रहे हैं।