सितंबर महीने में भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात घटकर **$4.04 बिलियन** रह गया है। अमेरिकी टैरिफ की अनिश्चितता के कारण रिफाइनर्स ने सतर्क रुख अपनाया है, हालांकि हालिया अमेरिकी वेवर (waiver) से फिलहाल राहत मिली है।
आयात में गिरावट और रिफाइनरी हब पर असर
सितंबर में भारत द्वारा रूस से किए जाने वाले कच्चे तेल के आयात में 12% की कमी आई है, जिससे कुल वैल्यू $4.04 बिलियन पर आ गई है। इस कटौती के पीछे मुख्य वजह घरेलू रिफाइनर्स की वह चिंता थी, जिसमें उन्हें मॉस्को से होने वाले ऊर्जा आयात पर अमेरिकी टैरिफ लगने का डर था। देश के प्रमुख रिफाइनिंग हब्स पर इसका असर साफ दिखा: जामनगर में 27%, पारादीप में 21% और वाडिनार में 8% की गिरावट दर्ज की गई।
बढ़ती कीमतें और दबाव
वॉल्यूम में गिरावट के साथ-साथ रिफाइनर्स के लिए फाइनेंशियल दबाव भी बढ़ा है। सितंबर में 'यूराल-ग्रेड' कच्चे तेल की औसत कीमत $90.7 प्रति बैरल पहुंच गई, जो पिछले महीने के मुकाबले 32% ज्यादा है। इस प्राइस बढ़ोतरी और कम आयात के कारण कुल हाइड्रोकार्बन आयात का मूल्य अगस्त के $5.39 बिलियन से गिरकर सितंबर में $4.1 बिलियन रह गया।
अमेरिकी वेवर से मिली अस्थायी राहत
अक्टूबर के मध्य में अमेरिकी सरकार द्वारा जारी किए गए पॉलिसी वेवर ने स्थिति को थोड़ा स्थिर किया है। 'नेशनल इंटरेस्ट' का हवाला देते हुए मिली इस छूट से भारतीय रिफाइनर्स को बिना किसी तत्काल दंड (punitive duties) के अपनी सप्लाई चेन को बनाए रखने का मौका मिला है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि दैनिक आयात 1.8 से 1.9 मिलियन बैरल के बीच रहने की उम्मीद है, लेकिन इस छूट की अस्थायी प्रकृति को देखते हुए रिफाइनर्स को सतर्क रहना होगा।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रिफाइनर्स का 'प्रॉफिट मार्जिन' है। यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और कंपनियां इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
