रिन्यूएबल एनर्जी पर PSA का ग्रहण, क्यों अटके 44 GW प्रोजेक्ट?
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर आज एक अहम मोड़ पर खड़ा है। देश नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन एक बड़ी समस्या इन परियोजनाओं को हकीकत में बदलने में रोड़ा बन रही है। करीब 43.9 GW की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता, जिसके पास लेटर ऑफ अवार्ड (LoA) है, अभी तक जरूरी पावर सेल एग्रीमेंट (PSA) पर हस्ताक्षर का इंतजार कर रही है। यह स्थिति भारत के 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता के लक्ष्य के लिए चिंता का विषय है।
RPO का दबाव और PSA पर चुप्पी
यह बात चिंताजनक है कि करीब 15 राज्यों में रिन्यूएबल एनर्जी मिनिस्ट्री ने PSA साइन करने में हो रही देरी को लेकर संपर्क साधा है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में प्रोजेक्ट्स, ग्रिड कनेक्टिविटी होने के बावजूद, सिर्फ PSA पर हस्ताक्षर न होने के कारण अटके हुए हैं। इन देरी की वजह से न सिर्फ 500 GW के लक्ष्य में बाधा आ रही है, बल्कि ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का भी सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। खास तौर पर राजस्थान (18.75 GW), आंध्र प्रदेश (7.11 GW) और कर्नाटक (6.99 GW) जैसे राज्य PSA पर हस्ताक्षर में देरी से बुरी तरह प्रभावित हैं।
RPO अनुपालन और पुरानी मुश्किलें
नवीकरणीय खरीद दायित्व (RPO) का मकसद डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (डिस्कॉम्स) और अन्य संस्थाओं को एक न्यूनतम मात्रा में रिन्यूएबल एनर्जी खरीदने के लिए बाध्य करना है। लेकिन, ऐतिहासिक तौर पर कई राज्यों में RPO का पालन ठीक से नहीं हुआ है। प्रवर्तन (enforcement) तंत्र कमजोर रहा और जुर्माना भी नहीं लगा। भले ही सरकार ने RPO के लक्ष्य तय किए हों, लेकिन राज्यों का अनुपालन लगातार inconsistent रहा है। इससे रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स के लिए मांग की निश्चितता कम हुई है, जो लंबे समय के PSA पर हस्ताक्षर करने में झिझक का कारण बनती है।
डिस्कॉम्स की बदलती वित्तीय सेहत
हाल के वर्षों में भारतीय डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (डिस्कॉम्स) की वित्तीय सेहत में काफी सुधार देखा गया है। फाइनेंशियल ईयर 25 में इन कंपनियों ने लगातार नुकसान झेलने के बाद कुल ₹2,701 करोड़ का नेट प्रॉफिट कमाया है। यह सुधार एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल (AT&C) लॉसेस में कमी और बेहतर लागत वसूली के कारण हुआ है। हालांकि, इन कंपनियों में अभी भी कर्ज और क्रॉस-सब्सिडी जैसे मुद्दे बने हुए हैं, जो उन्हें नई, लंबी अवधि के पावर परचेज़ एग्रीमेंट (PSA) के प्रति जोखिम-विरोधी (risk-averse) बना सकते हैं, खासकर उन प्रोजेक्ट्स के लिए जिनमें क्रियान्वयन (implementation) को लेकर अनिश्चितता हो।
एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (ESS) का बढ़ता दबदबा
सौर और पवन ऊर्जा की इंटरमिटेंसी (अस्थिरता) और ग्रिड स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए, मार्केट तेजी से एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (ESS) के साथ इंटीग्रेटेड हाइब्रिड रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ रहा है। सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) ने एनर्जी स्टोरेज क्षमता के साथ रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स के लिए कई ऑक्शन किए हैं। हाल ही में 1.2 GW क्षमता के लिए हुए ऑक्शन, जिसमें 4.8 GWh की डेली पीक पावर सप्लाई शामिल थी, INR 6.27/kWh के आसपास टैरिफ पर संपन्न हुए। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (BESS) अब केवल एक अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि सप्लाई और डिमांड को संतुलित करने, बिजली उत्पादन को स्थिर करने और महंगे ग्रिड अपग्रेड को टालने के लिए एक जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बन गए हैं।
अन्य कार्यान्वयन बाधाएं (Execution Bottlenecks)
PSA में देरी के अलावा, रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन में कई अन्य कारक भी बाधा डालते हैं। भूमि अधिग्रहण (land acquisition) में मुश्किलें, ट्रांसमिशन क्षमता की कमी और ट्रांसफार्मर व स्विचगियर जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों की लंबी डिलीवरी टाइमलाइन प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बनती है। रिन्यूएबल जनरेशन क्षमता में वृद्धि की तुलना में ट्रांसमिशन का विकास अक्सर पीछे रह जाता है, जिससे बिजली की निकासी (evacuation) में देरी होती है और प्रोजेक्ट का रिस्क प्रीमियम बढ़ जाता है।
आगे क्या?
भारतीय रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट अब परिपक्व हो रहा है। यह केवल क्षमता बढ़ाने से आगे बढ़कर ग्रिड स्थिरता और भरोसेमंद सप्लाई पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि हाइब्रिड रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स, राउंड-द-क्लॉक समाधान और स्टोरेज-समर्थित क्षमताएं बिजली उत्पादन और मांग के बीच के अंतर को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। डिस्कॉम्स की लाभप्रदता (profitability) एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन हरे बिजली के कुशल अवशोषण (absorption) को सुनिश्चित करने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन और होलसेल पावर मार्केट्स में सुधार जरूरी हैं। ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी स्टोरेज में लगातार निवेश, साथ ही राज्य-स्तरीय अनुमोदन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना, भारत की रिन्यूएबल एनर्जी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और 2030 तक 500 GW के लक्ष्य को हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।