एनर्जी ट्रांज़िशन में भारत की धाक
भारत रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में दुनिया का लीडर बनकर उभर रहा है। फिलहाल, हमारी कुल कैपेसिटी का लगभग 5% ग्लोबल कैपेसिटी में योगदान देता है, और हम इस मामले में दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं। आने वाले सालों में यह ग्रोथ और भी तेज होने वाली है। फाइनेंशियल ईयर 25 (FY25) में 475 गीगावाट (GW) पर खड़ी कैपेसिटी, 2030 तक बढ़कर 705 GW तक पहुंच सकती है।
इस बड़ी छलांग का मुख्य कारण है सोलर एनर्जी की लागत में 60.6% और विंड एनर्जी की लागत में 20.4% की भारी गिरावट (FY16 से FY24 के बीच)। इन कॉस्ट रिडक्शन की वजह से अब रिन्यूएबल एनर्जी, फॉसिल फ्यूल की तुलना में काफी सस्ती हो गई है, जिससे निवेश का रुख भी बदला है। भारत ने 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी का लक्ष्य रखा है, और अच्छी बात यह है कि हमने 2025 के मध्य तक 50% से ज्यादा नॉन-फॉसिल पावर कैपेसिटी हासिल कर ली है।
ग्रिड की स्थिरता और इंटीग्रेशन की मुश्किलें
कैपेसिटी तो तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इस रफ्तार से रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड में इंटीग्रेट करना एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। बड़ी मात्रा में आ रही सोलर और विंड पावर, जो कभी भी कम-ज्यादा हो सकती है, के लिए हमें अपने ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क्स को मजबूत करना होगा। इसके लिए करीब 150 बिलियन डॉलर तक के भारी निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
सोलर और विंड पावर की यह अस्थिरता (intermittency) ग्रिड को स्टेबल रखने और 24x7 बिजली सप्लाई सुनिश्चित करने में मुश्किलें पैदा कर रही है। इसीलिए, हाइब्रिड प्रोजेक्ट्स और एनर्जी स्टोरेज, जैसे बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पंप्ड हाइड्रो पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, ताकि पावर सप्लाई को लगातार बनाए रखा जा सके।
मार्केट की कॉम्पिटिशन और लागत का खेल
एडानी ग्रीन एनर्जी, एनटीपीसी, जेएसडब्ल्यू एनर्जी और टाटा पावर जैसे बड़े खिलाड़ी भारत के रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट में अपनी कैपेसिटी बढ़ा रहे हैं। भारत में यूटिलिटी-स्केल सोलर पावर की लागत 2010 से 2024 के बीच 91% कम हुई है, जिससे देश दुनिया में सबसे कॉम्पिटिटिव बन गया है। पहले सोलर टैरिफ ₹2 प्रति यूनिट तक गिर गए थे, हालांकि हाल के रुझान हवा (wind) टैरिफ में थोड़ी बढ़ोतरी का संकेत दे रहे हैं।
इन लागत फायदों के बावजूद, डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (DISCOMs) की खराब फाइनेंशियल हेल्थ अभी भी एक चिंता का विषय है। उनकी आर्थिक तंगी पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPAs) साइन करने में देरी कर सकती है और प्रोजेक्ट डेवलपमेंट को रोक सकती है।
ग्रोथ के रास्ते की बाधाएं और जियो-पॉलिटिकल जोखिम
तेजी के आंकड़ों के पीछे कई स्ट्रक्चरल कमजोरियां और बाहरी जोखिम भी हैं। सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि लिथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण मिनरल्स के लिए भारत 100% आयात पर निर्भर है, खासकर चीन से। यह निर्भरता सप्लाई में रुकावट, कीमतों में उतार-चढ़ाव और जियो-पॉलिटिकल दबावों का खतरा पैदा करती है।
इसके अलावा, जमीन अधिग्रहण की समस्याएं और रेगुलेटरी अड़चनें भी बड़े रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स को धीमा कर सकती हैं। कई रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए, हाई कैपिटल एक्सपेंडिचर (जो EBITDA के दोगुने तक हो सकता है) के कारण कर्ज का स्तर 8x नेट डेट-टू-EBITDA से ऊपर रहने का अनुमान है, जो फाइनेंशियल रिस्क को बढ़ाता है।
कुछ पुरानी विवादों, जैसे कि एडानी ग्रीन एनर्जी के चेयरमैन पर लगे आरोप, भी इन्वेस्टर्स के भरोसे और कंपनी वैल्यूएशन को प्रभावित कर सकते हैं।
भविष्य की राह और निवेश का माहौल
इन चुनौतियों के बावजूद, सरकारी नीतियों, टेक्नोलॉजी में प्रगति और इन्वेस्टर्स की दिलचस्पी के चलते भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर का भविष्य काफी हद तक पॉजिटिव दिख रहा है। एनालिस्ट्स का रुख अभी भी न्यूट्रल से लेकर ऑप्टिमिस्टिक है, और प्राइस टारगेट ग्रोथ की संभावनाओं को दर्शाते हैं।
सेक्टर को बड़ी मात्रा में निवेश की जरूरत है, जिसमें कैपेसिटी बढ़ाने के लिए लगभग 175 बिलियन डॉलर और ग्रिड सुधार के लिए 150 बिलियन डॉलर तक का अनुमान है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेटिव (PLI) स्कीम और सोलर पार्क जैसी पहल घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन को बढ़ावा दे रही हैं। हाइब्रिड प्रोजेक्ट्स, एनर्जी स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन पर लगातार फोकस, सेक्टर के विकसित होने और देश के डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए स्टेबल और रिलाएबल पावर देने की ओर इशारा करता है।