क्षमता का तूफान, स्टोरेज में सुस्ती?
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी (RE) सेक्टर रिकॉर्डतोड़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 के पहले 10 महीनों में ही 52.5 GW की नई पावर क्षमता जोड़ी गई, जिसमें रिन्यूएबल्स का हिस्सा करीब 75% रहा। अकेले सोलर पावर से 34.9 GW और विंड पावर से 4.6 GW का इजाफा हुआ। इसके साथ ही, जनवरी 2026 तक देश की कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 520 GW के पार पहुंच गई है, जिसमें नॉन-फॉसिल फ्यूल सोर्स का हिस्सा आधे से ज़्यादा है। अनुमान है कि FY32 तक रिन्यूएबल एनर्जी कुल क्षमता का लगभग 59% हो सकती है। इस सेक्टर की ग्रोथ का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसका P/E रेश्यो करीब 23.6x है, जो पिछले 3 साल के औसत से ज़्यादा है। Adani Green जैसी बड़ी कंपनियां $17.63 बिलियन के मार्केट कैपिटलाइजेशन के साथ इस सेक्टर में राज कर रही हैं। फरवरी 2026 में अमेरिका-भारत ट्रेड डील के बाद सोलर स्टॉक्स में आई तेजी ने निवेशकों के भरोसे को और बढ़ाया है।
एनर्जी स्टोरेज: एक गंभीर Bottleneck
इतनी बड़ी क्षमता खड़ी करने के बावजूद, एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (ESS) का विकास एक बड़ी रुकावट बन गया है। ये स्टोरेज सिस्टम सोलर और विंड जैसी रुक-रुक कर आने वाली एनर्जी को मैनेज करने के लिए बेहद ज़रूरी हैं। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के मुताबिक, 2029-30 तक 60 GW से ज़्यादा स्टोरेज क्षमता की ज़रूरत होगी, जिसमें 41.65 GW बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और 18.98 GW पांप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSP) शामिल होंगे। लेकिन फिलहाल, ऑपरेशनल BESS क्षमता बहुत ही शुरुआती दौर में है। PSPs के लिए 4 से 6 साल तक का लंबा कंस्ट्रक्शन टाइम लगता है, जबकि BESS को लागू करने में 18 से 24 महीने लगते हैं।
ऊंची लागत और PPAs का इंतजार
बैटरी की ऊंची लागत सीधे तौर पर टैरिफ को बढ़ा रही है। इसी वजह से बिजली कंपनियां लागत कम होने का इंतजार कर रही हैं और पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPAs) में देरी कर रही हैं। सरकार वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) जैसी स्कीमों से BESS डेवलपमेंट को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी इसे और रफ्तार देने की ज़रूरत है।
वित्तीय पहलू और भविष्य की राह
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेक्टर को सरकार का पूरा सपोर्ट है, लेकिन प्रोजेक्ट्स के टाइम पर एग्जीक्यूशन और स्टोरेज डेवलपमेंट पर पैनी नज़र रखने की ज़रूरत है। ICRA का अनुमान है कि FY26 में बिजली की मांग 4-4.5% तक बढ़ सकती है। 2026 में भारत अमेरिका को पछाड़कर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर मार्केट बन सकता है। हालांकि, इंपोर्टेड सामान की बढ़ती कीमतें और सोलर सेल व मॉड्यूल के लिए डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग के नियम (ALMM-II) सोलर मॉड्यूल की कीमतें बढ़ा रहे हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए कॉस्ट ऑफ कैपिटल भी एक चिंता का विषय बना हुआ है। IREDA का P/E रेश्यो फरवरी 2026 तक करीब 19x था।
जोखिम और चिंताएं
रिन्यूएबल एनर्जी की तेजी से बढ़ती क्षमता के मुकाबले एनर्जी स्टोरेज में धीमी प्रगति ग्रिड की स्थिरता और नए प्रोजेक्ट्स की आर्थिक व्यवहार्यता के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। अगर स्टोरेज क्षमता पर्याप्त नहीं हुई, तो रिन्यूएबल एनर्जी को 'कर्टेल' (यानी रोकना) पड़ सकता है, जिससे कंपनियों के रेवेन्यू और निवेशकों के भरोसे पर सीधा असर पड़ेगा। BESS से जुड़ी रिन्यूएबल एनर्जी के लिए ऊंची टैरिफ, PPAs को लेकर अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा, ज़मीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी और सप्लाई चेन की दिक्कतें भी प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन में देरी कर सकती हैं।
आगे क्या?
भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर का भविष्य मजबूत नीतिगत समर्थन और क्लीन एनर्जी लक्ष्यों के चलते स्थिर दिख रहा है। हालांकि, ESS डेवलपमेंट की रफ्तार सबसे अहम होगी। सरकार की ISTS चार्ज वेवर और VGF जैसी पहलें स्टोरेज को अपनाने में तेज़ी लाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। FY30 तक 600 GW से ज़्यादा नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता को सफलतापूर्वक एकीकृत करना सिर्फ जनरेशन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी स्टोरेज सॉल्यूशंस को मज़बूत करने पर भी निर्भर करेगा।