टेक्नोलॉजी की दौड़ और DISCOMs की चिंता
पावर सेक्टर में जनरेशन कैपेसिटी बढ़ाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) व बिग डेटा एनालिटिक्स जैसी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाने के बीच, एक बड़ी चुनौती सामने खड़ी है – देश भर की इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों (DISCOMs) की नाजुक वित्तीय स्थिति। CAG के. संजय मूर्ति ने हाल ही में एक कॉन्फ्रेंस में जोर दिया कि सेक्टर में हो रही नवाचारों और विस्तार का पूरा फायदा तभी मिलेगा जब DISCOMs की वित्तीय बुनियाद मजबूत होगी। तकनीकी प्रगति के बावजूद, इन कंपनियों की गंभीर आर्थिक समस्याएँ सेक्टर के आधुनिकीकरण और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पटरी से उतार सकती हैं।
नाजुक वित्तीय नींव
भारतीय पावर सेक्टर ने 2015-16 में 1,168 बिलियन यूनिट (BU) से 2025-26 तक 1,824 BU जनरेशन का लक्ष्य रखा है। लेकिन DISCOMs की लगातार खराब वित्तीय हालत इस लक्ष्य के रास्ते का रोड़ा बन रही है। 2022-23 तक, इन कंपनियों का कुल घाटा लगभग ₹6.77 लाख करोड़ तक पहुँच चुका था। हाई एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल (AT&C) लॉसेस, जो अक्सर 25-30% से ऊपर होते हैं, और सबसिडी वाले टैरिफ के कारण लागत वसूली की कमी, इस समस्या को और बढ़ा रही है। UDAY और Revamped Distribution Sector Scheme (RDSS) जैसी सरकारी राहत योजनाओं के बावजूद, DISCOMs अक्सर रेवेन्यू गैप को पाटने के लिए महंगे शॉर्ट-टर्म लोन पर निर्भर रहती हैं, जिससे उनकी माली हालत और खराब हो जाती है।
टेक्नोलॉजी की छलांग और वित्तीय बोझ
एक तरफ, पावर सेक्टर AI और बिग डेटा जैसी तकनीकों को अपनाकर अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ ग्रीन एनर्जी की ओर भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले एक दशक में रिन्यूएबल एनर्जी का शेयर 6% से बढ़कर 24% हो गया है, और 2025 के अंत तक कुल रिन्यूएबल कैपेसिटी कुल इंस्टॉल्ड बेस का लगभग 50% होने वाली है। ट्रांसमिशन नेटवर्क भी 5 लाख सर्किट किमी को पार कर गया है। हालांकि, अगर DISCOMs की वित्तीय दिक्कतें हल नहीं हुईं, तो ये सभी शानदार प्रगति खतरे में पड़ सकती है। भारत की एनर्जी ट्रांज़िशन के लिए हर साल लगभग US$145 बिलियन के निवेश की जरूरत है, ऐसे में DISCOMs की स्थिरता इनवेस्टमेंट को आकर्षित करने के लिए बेहद जरूरी है।
सेक्टर के दिग्गज और उनकी वित्तीय स्थिति
इस ट्रांसफॉर्मेशन में पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) सबसे आगे हैं। NTPC, भारत की सबसे बड़ी इंटीग्रेटेड पावर यूटिलिटी, FY25 तक लगभग 80 GW इंस्टॉल्ड कैपेसिटी के साथ, FY25 में ₹23,953 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया और इसका P/E रेश्यो लगभग 15.06 है। NHPC, एक प्रमुख हाइड्रो पावर प्रोड्यूसर, Q3 FY25 तक 7,233 MW कैपेसिटी के साथ, धीमी ग्रोथ और कम रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) का सामना कर रही है, जिसका P/E रेश्यो लगभग 29.0 है। पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (PGCIL), ट्रांसमिशन के लिए महत्वपूर्ण, 15.08 के P/E और 17.22% के मजबूत ROE के साथ काम कर रही है। पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC), एक अहम वित्तीय संस्थान, ने FY25 में ₹30,514 करोड़ का PAT रिपोर्ट किया, और इसका बैलेंस शीट ₹11.70 लाख करोड़ से ऊपर है।
सिस्टमैटिक रिस्क और रेगुलेटरी अड़चनें
DISCOMs की लगातार बनी हुई वित्तीय तंगी एक बड़ा सिस्टमैटिक रिस्क पैदा करती है। लगातार घाटे और भारी कर्ज के कारण ग्रिड आधुनिकीकरण और रिन्यूएबल एनर्जी के इवैक्यूएशन में जरूरी निवेश अटक सकता है, जो सेक्टर के विकास के इरादों के विपरीत है। राजनीतिक संवेदनशीलता के चलते कॉस्ट-रिफ्लेक्टिव टैरिफ लागू न कर पाना DISCOMs की रिकवरी के लिए एक गंभीर बाधा बना हुआ है, जिससे उन्हें सरकारी सबसिडी पर निर्भर रहना पड़ता है और उधार की लागत बढ़ जाती है। यह वित्तीय अस्थिरता प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बन सकती है, इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स की वायबिलिटी पर असर डाल सकती है, और 2047 तक 'विकसित भारत' के सरकारी विज़न को धीमा कर सकती है। PGCIL जैसी मजबूत कंपनियों के विपरीत, कई DISCOMs मामूली आर्थिक झटकों से भी हिल सकती हैं।
भविष्य का अनुमान
एक्सपर्ट्स को आने वाले बजट से मौजूदा स्कीम्स जैसे RDSS और ग्रीन एनर्जी पहलों को जारी रखने की उम्मीद है, न कि किसी नई बड़ी घोषणा की। भारत की एनर्जी ट्रांज़िशन के लिए सालाना US$145 बिलियन से अधिक के अनुमानित निवेश की जरूरत, एक स्थिर वित्तीय इकोसिस्टम की आवश्यकता को रेखांकित करती है। जबकि सेक्टर ट्रांसफॉर्म हो रहा है, इसकी सफलता DISCOMs की वित्तीय स्थिरता को संबोधित करने पर निर्भर करती है। यह ग्रिड आधुनिकीकरण के लिए प्राइवेट कैपिटल को अनलॉक करने और डीकार्बोनाइजेशन की तेज गति को बनाए रखने के लिए एक पूर्व शर्त है, जैसा कि मार्केट ऑब्ज़र्वर्स बता रहे हैं कि निवेशक आगे चलकर फंडामेंटल स्ट्रेंथ पर फोकस करेंगे।
