Power Sector: **900 GW** का महा-लक्ष्य और क्या हैं निवेश के बड़े रिस्क?

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AuthorNeha Patil|Published at:
Power Sector: **900 GW** का महा-लक्ष्य और क्या हैं निवेश के बड़े रिस्क?

भारत का पावर सेक्टर **FY32** तक **900 GW** क्षमता हासिल करने की दौड़ में है। **Q1FY27** में कंपनियों का मुनाफा **12%** बढ़ा है, लेकिन अब निवेशकों की नजर सिर्फ एक्सपेंशन पर नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट्स के समय पर पूरा होने पर टिकी है।

भारतीय पावर सेक्टर इस समय आक्रामक विस्तार के दौर से गुजर रहा है। सरकार का लक्ष्य FY32 तक 900 GW की कुल क्षमता हासिल करना है। इस तेजी को डिमांड का भी साथ मिल रहा है, क्योंकि उम्मीद है कि उसी समय तक पीक पावर डिमांड 366 GW तक पहुंच जाएगी। जून तिमाही में पावर यूटिलिटीज ने 12% की अर्निंग्स ग्रोथ दर्ज की है, जो बिजली की बढ़ती खपत को साफ दिखाती है।

असली चुनौती: एग्जीक्यूशन की रफ्तार

मार्केट अब सिर्फ बड़ी घोषणाओं को नहीं, बल्कि काम धरातल पर उतरने की हकीकत को देख रहा है। पावर सेक्टर अब 'ट्रांसमिशन-लेड' विस्तार चक्र में है, जहां बिजली पैदा करने के साथ-साथ उसे सही जगह पहुंचाना भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। इसके लिए ग्रिड स्टेबिलिटी, पंप स्टोरेज और बैटरी स्टोरेज सिस्टम में भारी निवेश की जरूरत है, जो पारंपरिक प्लांट के मुकाबले बनाना ज्यादा जटिल है।

प्रोजेक्ट्स में अड़चनें

कंपनियों की ऑर्डर बुक तो मजबूत है, लेकिन जमीन अधिग्रहण, ट्रांसमिशन लाइनों के लिए राइट-ऑफ-वे और स्किल्ड लेबर की कमी जैसे मुद्दे देरी का कारण बन रहे हैं। Power Grid Corporation जैसे दिग्गजों का कैपेक्स तो स्थिर है, लेकिन एनालिस्ट्स अब प्रोजेक्ट्स में देरी और बढ़ती लागत (Cost Overruns) पर नजर रख रहे हैं। प्रोजेक्ट्स में देरी का सीधा असर कंपनियों के रिटर्न और कर्ज के बोझ पर पड़ सकता है।

कंपनियों की रणनीति

NTPC जैसे बड़े खिलाड़ी लंबी अवधि के पावर परचेज एग्रीमेंट के जरिए अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित कर रहे हैं। Adani Power अपनी थर्मल स्ट्रेंथ पर फोकस कर रही है, जबकि हाइड्रो पावर कंपनियां खराब मौसम की मार झेल रही हैं। वहीं, Bharat Heavy Electricals Limited अपनी मजबूत ऑर्डर बुक का लाभ उठा रही है, लेकिन सोलर इक्विपमेंट के सस्ते विकल्पों से उन्हें कड़ा मुकाबला मिल रहा है।

रेगुलेटरी रिस्क और आगे का रास्ता

Central Electricity Regulatory Commission की मार्केट कपलिंग से जुड़ी नई रेगुलेशंस Indian Energy Exchange के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा, Indian Gas Exchange में हिस्सेदारी घटाने की योजना भी एक बड़ा बदलाव है। निवेशकों के लिए अब केवल बड़ा टारगेट देखना काफी नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि कंपनियां बिना बजट बढ़ाए अपने प्रोजेक्ट्स को कब तक चालू (Commissioning) कर पाती हैं और कर्ज का प्रबंधन कैसे करती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.