हाइब्रिड और स्टोरेज की ओर क्यों झुक रहा है सेक्टर?
यह रणनीतिक बदलाव बिजली क्षेत्र में बढ़ती मांग और रिन्यूएबल एनर्जी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ज़रूरी हो गया है। जनवरी 2026 में, सोलर पावर की कम कीमत, जो लगभग ₹4.3 प्रति किलोवॉट-घंटा थी, यह दर्शाती है कि दिन के उजाले में बिजली की आपूर्ति अधिक हो रही है। लेकिन, जब सूरज नहीं होता, तब भी बिजली की जरूरत बनी रहती है। इसी 'अनियमितता' (intermittency) को दूर करने और ग्रिड को स्थिर रखने के लिए एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (ESS) की अहमियत बढ़ गई है। भारत का पावर सेक्टर अब अपनी टेंडरिंग पाइपलाइन को हाइब्रिड (रिन्यूएबल एनर्जी + स्टोरेज) और स्टोरेज-आधारित प्रोजेक्ट्स की ओर मोड़ रहा है। यह न केवल बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा, बल्कि अतिरिक्त सोलर पावर को स्टोर करके उसे डिस्पैचेबल पावर में बदलने का एक बेहतरीन तरीका भी है।
मांग में तेज़ी और ग्रिड की नई चुनौतियां
जनवरी 2026 में, भारत की कुल बिजली मांग में पिछले साल की तुलना में 4.8% की मज़बूत बढ़ोतरी देखी गई। वहीं, पीक डिमांड लगभग 3% बढ़कर 245 गीगावाट तक पहुंच गई, जो देश की मज़बूत आर्थिक गतिविधि का संकेत है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ रहा है। रिन्यूएबल एनर्जी, जैसे सोलर और विंड, को ग्रिड में एकीकृत करना एक बड़ी चुनौती है, खासकर जब ट्रांसमिशन लाइनें और पुराने ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर इन अस्थिर स्रोतों को संभालने में संघर्ष करते हैं।
बिजली ट्रेडिंग में उछाल और REC की घटती भूमिका
इन गतिशील परिदृश्यों को देखते हुए, भारतीय एनर्जी एक्सचेंज (IEX) पर बिजली ट्रेडिंग में 19.6% की साल-दर-साल (YoY) बढ़ोतरी दर्ज की गई। खासकर, रियल-टाइम मार्केट (RTM) में 52.8% की ज़बरदस्त उछाल देखी गई, जो बाज़ार की तेज़ी से प्रतिक्रिया करने की क्षमता को दर्शाता है। हालांकि, इसी अवधि में रिन्यूएबल एनर्जी सर्टिफिकेट (REC) के वॉल्यूम में 13% की गिरावट आई है। यह दर्शाता है कि बाज़ार अब केवल सर्टिफिकेट-आधारित अनुपालन से हटकर, एकीकृत जनरेशन और स्टोरेज समाधानों की ओर बढ़ रहा है। ऐतिहासिक रूप से, REC की कीमतें प्रवर्तन संबंधी मुद्दों और आपूर्ति-मांग में असंतुलन के कारण अस्थिर रही हैं।
थर्मल पावर का बदलता अंदाज़
जनवरी 2026 में थर्मल पावर प्लांट का उपयोग (Plant Load Factor - PLF) 67.7% पर स्थिर रहा। हालांकि, अनुमान है कि पूरे फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए थर्मल PLF लगभग 66.5% तक कम हो सकता है। ऐसा रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़त और धीमी मांग वृद्धि के कारण हो रहा है। यह स्थिति थर्मल एसेट्स की वित्तीय व्यवहार्यता पर असर डाल सकती है, खासकर उन मर्चेंट जेनरेटरों के लिए जिनके पास दीर्घकालिक पावर परचेस एग्रीमेंट (PPAs) नहीं हैं। नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी (NEP) 2026 के ड्राफ्ट में थर्मल पावर की भूमिका को बेसलोड प्रभुत्व से बदलकर लचीलेपन-संचालित भूमिका में लाने का प्रस्ताव है, जिसमें स्टोरेज और क्लीनर टेक्नोलॉजीज़ के साथ एकीकरण पर ज़ोर दिया गया है।
भविष्य की राह
भारत का लक्ष्य 2029-30 तक 336 GWh और 2031-32 तक 411 GWh एनर्जी स्टोरेज क्षमता हासिल करना है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (CERC) ने भी इंटीग्रेटेड एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (IESS) के लिए एक फ्रेमवर्क पेश किया है, जो ग्रिड आर्किटेक्चर में स्टोरेज को एक मुख्य घटक के रूप में मान्यता देता है। भविष्य में, बाज़ार ऐसे एकीकृत समाधानों की ओर बढ़ेगा जो जनरेशन, स्टोरेज और ग्रिड मैनेजमेंट को ऑप्टिमाइज़ करते हैं, ताकि एक स्थिर और टिकाऊ बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।