दशकों के घाटे से निपटने की तैयारी
भारतीय बिजली वितरण सेक्टर कई सालों से लगातार घाटे और भारी कर्ज के जाल में फंसा हुआ है। इस सेक्टर में लगभग हर 30 सालों में बड़े पुनर्गठन (Restructuring) हुए हैं, लेकिन स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया। वित्त वर्ष 2024 के अंत तक, इस सेक्टर पर कुल बकाया कर्ज ₹7.5 लाख करोड़ के पार जा चुका था, जबकि जमा हुए कुल नुकसान (Accumulated Losses) ₹6.77 लाख करोड़ थे। यह आर्थिक बोझ राज्यों के खजाने पर भारी पड़ रहा है।
कई राज्यों में तो कर्ज, उनकी आय और संपत्ति की वृद्धि से कहीं ज़्यादा बढ़ गया है। आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय और तेलंगाना जैसे राज्यों में यह स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, तमिलनाडु और राजस्थान जैसे राज्यों में तो डिस्कॉम (Discoms) का अकेला नुकसान ही राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के 6% से भी ज़्यादा हो गया है, जो सीधे तौर पर गंभीर वित्तीय दबाव की ओर इशारा करता है।
SPV मॉडल से कर्ज़ का बोझ होगा कम
आयोग ने इस समस्या से पार पाने के लिए एक खास तरीका सुझाया है - स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) का गठन। राज्यों को ये SPVs बनाने होंगे, जिनमें मौजूदा खराब कर्ज (Bad Debt) और परिचालन संबंधी ऋण (Working Capital Loans) को अलग रखा जाएगा। ऐसा करने से डिस्कॉम की बैलेंस शीट साफ हो जाएगी, जो निजी निवेशकों (Private Investors) को आकर्षित करने में मदद करेगा।
प्राइवेटाइजेशन पर मिलेगी केंद्र की मदद
SPVs में रखे गए कर्ज़ के भुगतान या समय से पहले भुगतान (Prepayment) के लिए केंद्र सरकार से सहायता (Central Assistance) मिल सकती है। यह सरकारी मदद सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य प्राइवेटाइजेशन की दिशा में कितना आगे बढ़ते हैं। यानी, जो राज्य इस सुधार के लिए प्रतिबद्ध होंगे, उन्हें नए इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के लिए सरकारी सहायता मिलने की उम्मीद है।
आधुनिकीकरण और सेक्टर का भविष्य
वित्त आयोग का मानना है कि प्राइवेटाइजेशन न केवल वित्तीय समस्याओं को हल करेगा, बल्कि बिजली वितरण के इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) को आधुनिक बनाने में भी अहम भूमिका निभाएगा। इससे बिजली की सप्लाई बेहतर, परिचालन (Operations) अधिक कुशल होंगे और देश की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा किया जा सकेगा। यह कदम 'रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम' (RDSS) और ड्राफ्ट नेशनल इलेक्ट्रिसिटी पॉलिसी 2026 जैसी पहलों के साथ भी जुड़ा हुआ है।
भारतीय बिजली बाजार का आकार बहुत बड़ा है, जिसका अनुमान $844 बिलियन (2025) लगाया गया है। वित्त वर्ष 2025 से 2030 के बीच इसमें करीब ₹25–26 ट्रिलियन के निवेश की संभावना है। प्रस्तावित प्राइवेटाइजेशन और SPV मॉडल इस क्षेत्र में ज़रूरी निजी पूंजी को आकर्षित कर सकता है, जो इसके विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।