भारत में बिजली वितरण क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियों की एंट्री की राह मुश्किल हो गई है। हरियाणा सहित कई राज्य सरकारों ने सरकारी बिजली कंपनियों (DISCOMs) के हितों को बचाने के लिए प्राइवेट प्लेयर्स की एंट्री पर रोक लगा दी है, जिससे मार्केट में प्रतिस्पर्धा का रास्ता फिलहाल बंद होता दिख रहा है।
प्राइवेट एंट्री पर ब्रेक
केंद्र सरकार का 'पैरेलल लाइसेंसिंग' (Parallel Licensing) का विजन, जिसके जरिए उपभोक्ताओं को बिजली कंपनियों को चुनने की आजादी मिलने वाली थी, अब राज्यों की सख्ती का शिकार हो गया है। हाल ही में, हरियाणा सरकार ने स्टेट रेगुलेटर को Eleven Power Private Ltd के 25-वर्षीय डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस प्रोसेस को रोकने का आदेश दिया है, जो गुरुग्राम और नूह क्षेत्रों के लिए प्रस्तावित था।
क्यों विरोध कर रहे हैं राज्य?
इस गतिरोध के पीछे बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) का फाइनेंशियल स्ट्रक्चर है। मौजूदा व्यवस्था में इंडस्ट्रियल और कमर्शियल उपभोक्ता ज्यादा टैरिफ देते हैं, जिससे खेती और घरों के लिए बिजली की दरों को कम रखा जाता है। अगर कोई प्राइवेट कंपनी बाजार में आती है, तो वह सबसे पहले इन बड़े मुनाफे वाले ग्राहकों को अपने पाले में करने की कोशिश करेगी। इससे सरकारी DISCOMs के पास केवल घाटे वाला पोर्टफोलियो बचेगा। इसी डर और नौकरियों के नुकसान की आशंका के चलते राज्य सरकारें और लेबर यूनियन प्राइवेट कंपनियों की एंट्री का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
मुंबई से अलग बाकी भारत का हाल
दूरसंचार (Telecom) क्षेत्र की तरह बिजली सेक्टर में भी प्रतिस्पर्धा लाने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन फिलहाल केवल मुंबई ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां पैरेलल लाइसेंसिंग सफल रही है। अन्य राज्य 'Electricity Act' की Section 108 का इस्तेमाल करके रेगुलेटरी फैसलों को ओवरराइड कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
पावर सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए यह संकेत साफ है कि डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल का पूरी तरह से मार्केट-ड्रिवन बनना उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबा और जटिल सफर होगा। हालांकि, पावर जेनरेशन, स्मार्ट मीटरिंग और ग्रिड मॉडर्नाइजेशन में निवेश जारी रहेगा, लेकिन डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस पर निकट भविष्य में राज्य सरकारों का ही दबदबा बना रहने की संभावना है।
