रात का एनर्जी ट्रैप
भारत में मौजूदा एनर्जी संकट एक स्ट्रक्चरल फेलियर (structural failure) है, जिसकी वजहें रातें ठंडी न होना है। पिछली हीटवेव (heatwave) के विपरीत, करीब 35°C तापमान के कारण शहरी इलाके पैसिवली (passively) ठंडा नहीं हो पा रहे हैं। इससे एनर्जी की लगातार मांग बनी रहती है, जो पावर ग्रिड और ट्रांसफार्मर के लिए सामान्य रिकवरी पीरियड (recovery period) को खत्म कर देती है। ग्रिड के ठंडा न हो पाने की वजह से टेक्निकल लॉस (technical losses) बढ़ जाते हैं और उपकरण खराब होने की घटनाएं भी बढ़ती हैं, जिससे ग्रिड मैनेजमेंट बेअसर हो जाता है।
इंडस्ट्रियल और मैक्रो नतीजे
जहां आम जनता को गर्मी से परेशानी हो रही है, वहीं इंडस्ट्री पर इसका गंभीर असर पड़ा है। डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां हर रात 5 गीगावाट की एनर्जी गैप (energy gap) को भरने के लिए स्पॉट मार्केट (spot market) से बिजली खरीदने के कारण भारी प्राइस वोलाटिलिटी (price volatility) का सामना कर रही हैं। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट (Middle East) के भू-राजनीतिक तनावों के कारण ग्लोबल एलएनजी (LNG) मार्केट में उतार-चढ़ाव भी गैस-आधारित पावर प्लांट्स की प्रभावशीलता को सीमित कर रहा है। यह दबाव भारत के मौजूदा रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) सेटअप की कमजोरियों को भी उजागर करता है; भले ही सोलर पावर (solar power) बढ़ा है, लेकिन रात में बिजली नहीं देता। ऐसे में कोयला-आधारित पावर पर भारी निर्भरता बढ़ जाती है, जो पहले से ही अपनी अधिकतम क्षमता पर चल रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रेगुलेटरी रिस्क
मुख्य कमजोरी तेज शहरी विकास और यूटिलिटी इन्वेस्टमेंट (utility investment) के बीच तालमेल की कमी है। कई राज्यों में डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटीज (distribution utilities) पुराने ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (transmission infrastructure) का इस्तेमाल कर रही हैं, जो मौजूदा हाई डिमांड को पूरा नहीं कर सकता। इसके अलावा, भारत में बिजली की कीमतें अक्सर घरों के लिए सबसिडी वाली होती हैं, जिससे ग्रिड अपग्रेड (grid upgrades) और डिमांड मैनेजमेंट (demand management) में जरूरी निवेश हतोत्साहित होता है। रेगुलेटरी इंटरवेंशन (regulatory intervention) का खतरा भी बढ़ रहा है। यूटिलिटीज को शायद औद्योगिक जरूरतों के बजाय घरों की कूलिंग को प्राथमिकता देनी पड़े, जिससे प्रभावित इलाकों में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स (manufacturing plants) के संचालन पर सीधा खतरा मंडराएगा। स्पॉट मार्केट पर निर्भर रहना एक अस्थायी समाधान है, जो लंबे समय तक जारी रहने पर सरकारी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों की वित्तीय सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।
भविष्य का आउटलुक और सेक्टर ट्रेंड्स
विशेषज्ञ सेंट्रल ग्रिड की अस्थिरता को प्रबंधित करने के लिए बिजनेस के लिए माइक्रो ग्रिड (microgrids) जैसे डिसेंट्रलाइज्ड एनर्जी सॉल्यूशंस (decentralized energy solutions) के विकास पर नजर रख रहे हैं। हालांकि, अल्पावधि में, पावर प्लांट्स के लिए पर्याप्त ईंधन सुनिश्चित करने हेतु डोमेस्टिक कोल प्रोडक्शन (domestic coal production) और कुशल लॉजिस्टिक्स (logistics) पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। बिल्डिंग कोड्स (building codes) और शहरी डिजाइन (urban design) के माध्यम से रात में गर्मी के फैलाव पर ध्यान न देने की कमी से यह पता चलता है कि गर्मियों के महीनों के दौरान पावर डिस्टर्बेंस (power disruptions) जारी रहने की संभावना है। यह अगले तीन से पांच वर्षों में स्मार्ट-ग्रिड टेक्नोलॉजी (smart-grid technology) और बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज सिस्टम (battery storage systems) में अधिक निवेश की आवश्यकता को दर्शाता है।
