दबाव में बिजली का इंफ्रास्ट्रक्चर
इस गर्मी में भारत का पावर ग्रिड अभूतपूर्व दबाव से गुजर रहा है। गुरुवार को, बिजली की अधिकतम मांग (Peak Demand) लगभग 240 गीगावॉट तक पहुंच गई। बढ़ती गर्मी और एयर कंडीशनिंग (AC) के बढ़ते इस्तेमाल ने बिजली की मांग को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। यह आंकड़ा सितंबर 2023 में दर्ज किए गए 243.27 गीगावॉट के रिकॉर्ड के बहुत करीब है। उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत में हीटवेव की स्थिति बनी रहने से यह दबाव और बढ़ने की उम्मीद है। ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of Power) ने अनुमान लगाया है कि 2026 की गर्मियों में पीक डिमांड करीब 270 गीगावॉट तक जा सकती है, जो आने वाले समय में ऊर्जा प्रदाताओं और ग्रिड ऑपरेटरों के लिए बड़ी चुनौती पेश करेगा। पिछले पांच सालों में बिजली की मांग औसतन 7-8% सालाना बढ़ी है, और हीटवेव इसे और बढ़ा देती है, जिससे फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता का एक दुष्चक्र बन सकता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर तैयारी और निवेश की खाई
भारत की बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए अगले दो दशकों में पावर सेक्टर में लगभग $2.2 ट्रिलियन के भारी निवेश की जरूरत है। हालांकि, भारत की इंस्टॉलड जनरेशन कैपेसिटी जनवरी 2026 तक 520.51 गीगावॉट तक बढ़ चुकी है और 2035-36 तक 1,121 गीगावॉट तक पहुंचने की योजना है, फिर भी चरम मौसम की घटनाओं के दौरान पीक लोड को मैनेज करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश अब केवल पर्याप्त जनरेशन कैपेसिटी रखने से आगे बढ़कर सिस्टम की फ्लेक्सिबिलिटी और पीक लोड मैनेजमेंट पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके लिए एनर्जी स्टोरेज, जैसे कि पंप हाइड्रो और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS), के साथ-साथ अधिक फ्लेक्सिबल हाइड्रो रिसोर्सेज में तेज निवेश की आवश्यकता है। सरकार 2030 तक 500 गीगावॉट नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी का लक्ष्य लेकर चल रही है, जिसमें 2024 में रिन्यूएबल एनर्जी पहले से ही इंस्टॉलड कैपेसिटी का 44% है। लेकिन, इन वेरिएबल रिन्यूएबल सोर्सेज को इंटीग्रेट करने से ग्रिड की स्थिरता को लेकर गंभीर चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। अगले छह वर्षों में ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने के लिए अनुमानित ₹7.6 ट्रिलियन के निवेश की आवश्यकता है। तत्काल सप्लाई को मजबूत करने के लिए, थर्मल पावर प्लांटों के मेंटेनेंस को टालने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं ताकि करीब 10,000 मेगावॉट अतिरिक्त बिजली उपलब्ध हो सके, साथ ही रिन्यूएबल और बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स को भी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि, गैर-सौर घंटों के लिए इंपोर्टेड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) पर निर्भरता, और मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनावों के कारण कीमतों और उपलब्धता पर असर, सप्लाई चेन की कमजोरियों को उजागर करता है।
मुख्य जोखिम और निवेशकों की चिंताएं
सरकारी आश्वासनों के बावजूद कि पर्याप्त बिजली उपलब्ध रहेगी, बढ़ती हीटवेव परिदृश्य सप्लाई-डिमांड मिसमैच और संभावित रुकावटों का एक महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करता है। "हीट-पावर ट्रैप" (गर्मी-बिजली का जाल) एक वास्तविक चिंता है, जहां बढ़ती गर्मी से ऊर्जा की खपत बढ़ जाती है, जो अक्सर फॉसिल फ्यूल से पूरी होती है, जिससे जलवायु परिवर्तन और भी गंभीर हो जाता है और हीटवेव और भी तीव्र हो जाती है। कैपेसिटी तो बढ़ रही है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाली अत्यधिक गर्मी में ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की मजबूती एक चिंता का विषय बनी हुई है। कुछ पावर सेक्टर स्टॉक्स, जैसे कि अडानी पावर (Adani Power) का P/E लगभग 36x है, और इसका फेयर वैल्यू अनुमान इसकी मौजूदा कीमत से काफी कम है, जो बाजार की अस्थिरता के बीच ओवरवैल्यूएशन की संभावना का संकेत देता है। अमेरिका-ईरान संघर्ष (US-Iran conflict) और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में व्यवधान जैसे भू-राजनीतिक अस्थिरता ने कच्चे तेल की कीमतों को $100 प्रति बैरल से ऊपर धकेल दिया है, जिससे महंगाई बढ़ी है, करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) चौड़ा हुआ है, और भारतीय रुपये पर दबाव पड़ा है। यह सीधे तौर पर ऊर्जा आयात की लागत और समग्र बाजार भावना को प्रभावित करता है। ऊर्जा मूल्य वृद्धि और सप्लाई चेन में व्यवधान एक चुनौतीपूर्ण परिचालन माहौल बना सकते हैं, जिससे अर्निंग्स डाउनग्रेड और बाजार में गिरावट आ सकती है।
