रूस का सस्ता तेल या अमेरिका की डील? भारत के सामने बड़ी कशमकश, ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
रूस का सस्ता तेल या अमेरिका की डील? भारत के सामने बड़ी कशमकश, ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल
Overview

रूसी Urals क्रूड (crude) पर छूट (discount) लगातार बढ़ रही है, जो शिपिंग लागत (shipping costs) को मिलाकर Brent क्रूड से **$10** प्रति बैरल से भी ज़्यादा हो गई है। वहीं, भारत और अमेरिका के बीच एक नई ट्रेड डील हुई है, जिसमें अमेरिकी टैरिफ (tariffs) **50%** से घटकर **18%** हो जाएंगे। लेकिन इस डील का एक बड़ा, अभी तक कन्फर्म न हुआ पहलू यह है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर सकता है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा (energy security) को भू-राजनीतिक (geopolitical) संरेखण के साथ साधने की एक बड़ी चुनौती पेश करता है।

ट्रेड डील और तेल का पेच

अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणाओं के बीच, भारत और अमेरिका ने एक अहम ट्रेड एग्रीमेंट (trade agreement) किया है, जिसके तहत भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ (tariffs) 50% से घटकर 18% हो जाएंगे। यह लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, इस डील का एक ऐसा पहलू भी सामने आ रहा है जो अभी तक कन्फर्म नहीं हुआ है, लेकिन वह काफी मायने रखता है: यह माना जा रहा है कि भारत ने रूस से तेल का आयात रोकने पर सहमति जताई है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब रूस का Urals क्रूड (crude) बाज़ार में भारी छूट पर उपलब्ध है। मार्केट इंटेलिजेंस फर्म Argus के अनुसार, रूसी Urals क्रूड पर शिपिंग लागत सहित $11 प्रति बैरल तक की छूट मिल रही है, जो Brent क्रूड के मुकाबले काफी कम है। तुलनात्मक रूप से, वेनेजुएला का भारी क्रूड $9.50 से $15 प्रति बैरल तक के डिस्काउंट पर मिल रहा है। इस डील के गुप्त समझौते (unconfirmed component) की वजह से भारतीय रिफाइनरी ऑपरेटर्स (refinery operators) में अनिश्चितता का माहौल है।

भारत की ऊर्जा रणनीति और आर्थिक असर

यह ध्यान देने वाली बात है कि भारत पारंपरिक रूप से रूस का बड़ा तेल खरीदार नहीं रहा है। लेकिन, 2022 की शुरुआत में यूक्रेन पर हमले के बाद, रूस द्वारा भारी डिस्काउंट पर तेल की पेशकश के कारण भारत ने इसका आयात काफी बढ़ा दिया था। अनुमान है कि इस सस्ते रूसी तेल से भारत ने 2022 के बाद से लगभग $17 अरब डॉलर की बचत की है। हाल के महीनों में आयात कुछ कम हुए थे, लेकिन जनवरी में यह औसत 12 लाख बैरल प्रति दिन रहा, जो एक समय 20 लाख बैरल प्रति दिन के शिखर से काफी कम है। हालाँकि, पिछले साल अक्टूबर 2025 में अमेरिका द्वारा रूसी ऊर्जा कंपनियों जैसे Rosneft और Lukoil पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, नवंबर 2025 में रूस से कच्चे तेल का आयात काफी गिर गया था। अब, यदि भारत रूसी तेल से पूरी तरह मुंह मोड़ता है, तो इसके बड़े आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। अनुमान है कि इससे सालाना तेल आयात का खर्च $6-7 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है और रिफाइनरियों के ऑपरेशनल कॉस्ट (operational costs) में लगभग 2% की वृद्धि हो सकती है। भारतीय रिफाइनरियों जैसे Indian Oil Corporation (IOC) का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो करीब 9.0x से 9.95x है, जिनकी मार्केट कैप लगभग ₹2.42 लाख करोड़ है। वहीं, Bharat Petroleum और ONGC जैसी कंपनियों का P/E रेश्यो और भी कम, क्रमशः 6.4x और 7.97x है। भारतीय ऑयल एंड गैस सेक्टर का औसत P/E 14.4x है। विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत के ऊर्जा क्षेत्र में मांग सालाना 5.5% से 6.0% तक बढ़ेगी, हालांकि एशियाई रिफाइनिंग मार्जिन (refining margins) पर कुछ दबाव रह सकता है।

बाज़ार की चाल और आगे का रास्ता

यह मौजूदा भू-राजनीतिक चालें (geopolitical maneuvering) दिखाती हैं कि रूस अपनी छूट वाली तेल पेशकशों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय समझौतों की मजबूती को परखने के लिए कर रहा है। हालांकि भारत ने नवंबर के प्रतिबंधों के बाद से रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम की है, लेकिन अगर वह इस तरह की भारी छूट वाले तेल को छोड़ता है, तो उसे ऊंची कीमत वाले विकल्पों की तलाश करनी पड़ेगी। इससे घरेलू ईंधन की कीमतों और समग्र आर्थिक महंगाई (inflation) पर असर पड़ सकता है। मौजूदा समय में, Brent क्रूड $67.97 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जिसका 52-सप्ताह का दायरा $58.40 से $81.40 रहा है। ऐतिहासिक रूप से, प्रतिबंधों के बीच दिसंबर 2025 में Urals और Brent के बीच का अंतर लगभग $27 बैरल तक बढ़ गया था। India Ratings and Research के विश्लेषकों का फाइनेंशियल ईयर FY27 के लिए ऑयल एंड गैस सेक्टर पर एक न्यूट्रल (neutral) आउटलुक है, जो मांग और मार्केटिंग मार्जिन (marketing margins) से प्रेरित डाउनस्ट्रीम कंपनियों (downstream companies) के लिए स्थिर क्रेडिट प्रोफाइल की उम्मीद कर रहे हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रूस पर लगी छूट वाले तेल की कीमतें कितनी टिकाऊ रहती हैं, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों को अपने व्यापारिक रिश्तों से तय की गई भू-राजनीतिक गणनाओं (geopolitical calculus) के साथ संतुलित कर रहा है।
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