सरकार का हस्तक्षेप: OMCs को मिलेगी राहत?
इस भारी वित्तीय दबाव को कम करने के लिए, सरकार ने OMCs को सहारा देने का फैसला किया है। अब ये सरकारी कंपनियां घरेलू रिफाइनरियों से पेट्रोल, डीजल, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) और केरोसिन जैसे रिफाइंड प्रोडक्ट्स को डिस्काउंट पर खरीद सकेंगी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य जनवरी के स्तर पर स्थिर रिटेल कीमतों को बनाए रखने से होने वाले नुकसान को कुछ हद तक कम करना है।
बढ़ती ग्लोबल कीमतें vs भारत की स्थिर दरें
Kotak की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर के कई विकसित और उभरते देशों में ईंधन की लागत में बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में डीजल की कीमतों में 84% का इजाफा हुआ है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में यह क्रमशः 65% और 62% तक बढ़ा है। इसके उलट, भारत में डीजल की खुदरा कीमतें जनवरी के स्तर ₹87.6 प्रति लीटर पर ही अटकी हुई हैं, और पेट्रोल की कीमत भी ₹94.7 प्रति लीटर पर स्थिर बनी हुई है। यह स्थिति लगभग सभी अन्य देशों से बिल्कुल अलग है।
OMCs पर पड़ रहा भारी बोझ
उपभोक्ताओं को राहत देने के बावजूद, भारतीय OMCs पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ रहा है। Macquarie Group का अनुमान है कि मौजूदा स्पॉट कीमतों पर OMCs को पेट्रोल पर प्रति लीटर करीब ₹18 और डीजल पर ₹35 का नुकसान झेलना पड़ रहा है। Kotak Institutional Equities का आकलन और भी गंभीर है, जिसके अनुसार बढ़ते क्रूड ऑयल और टैक्स के बोझ के चलते यह नुकसान पेट्रोल पर ₹24 और डीजल पर ₹60 प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। ऐसे हालात में, Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum Corporation (BPCL), और Hindustan Petroleum Corporation (HPCL) जैसी कंपनियों के संयुक्त तिमाही मुनाफे में 82% की सालाना गिरावट आने की आशंका है। वर्तमान में, ब्रेंट क्रूड $95.04 प्रति बैरल और WTI $86.58 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जो वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों को दर्शाता है।
अर्थव्यवस्था पर असर: रुपया, घाटा और महंगाई
ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने की इस नीति का भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता पर सीधा असर पड़ रहा है। कच्चा तेल (Crude Oil) भारत का सबसे बड़ा आयात है, जिसका 2023-24 में मूल्य करीब USD 180 बिलियन था। तेल की ऊंची कीमतें करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को बढ़ाती हैं, और हर $10 प्रति बैरल की वृद्धि GDP को 0.4% तक प्रभावित कर सकती है। भारतीय रुपया भी 93-94.8 प्रति डॉलर के स्तर तक कमजोर हुआ है, जिससे आयात बिल और महंगाई का दबाव बढ़ा है।
अस्थिरता और आगे की राह
हालांकि उपभोक्ताओं को तत्काल मूल्य वृद्धि से बचाया गया है, लेकिन सरकार और OMCs पर वित्तीय बोझ बहुत बढ़ गया है। प्रति लीटर होने वाले ये नुकसान लंबे समय तक टिकाऊ नहीं माने जा रहे हैं और इससे भारत के फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटे) के बढ़कर FY27 के 4.3% GDP के लक्ष्य को खतरे में डालने की आशंका है। मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहने की संभावना है। OMCs को भले ही मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन (जैसे IOCL का $10.10/barrel, BPCL का $12/barrel) से कुछ फायदा हो रहा है, लेकिन यह मार्केटिंग से हो रहे भारी नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। वहीं, Nayara Energy और Shell जैसे प्राइवेट कंपनियाँ पहले ही अपनी कीमतों में बदलाव कर रही हैं, जो सरकारी कंपनियों पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
क्या चुनाव के बाद बढ़ेंगे दाम?
विश्लेषकों की राय इस बारे में मिली-जुली है। कुछ रिपोर्टों का सुझाव है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर हुईं और मार्केटिंग मार्जिन में सुधार हुआ, तो OMC स्टॉक्स में वापसी संभव है। हालांकि, वर्तमान बाजार की स्थितियां और OMCs द्वारा झेले जा रहे भारी नुकसान को देखते हुए, यह संभावना जताई जा रही है कि कीमतों में सुधार, शायद चुनावों के बाद, देखने को मिल सकता है। OMCs के शेयरों का मौजूदा मूल्यांकन (valuation) कुछ सहारा दे रहा है, लेकिन लगातार उच्च क्रूड कीमतें और मूल्य फ्रीज उनकी कमाई की संभावनाओं के लिए एक बड़ा जोखिम बने हुए हैं।
