Fuel Price Policy का डबल झटका
यह मुश्किल तब बढ़ी जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें $70 प्रति बैरल से चढ़कर $122 प्रति बैरल तक पहुंच गईं। जहां साउथ ईस्ट एशिया में 30% से 50%, नॉर्थ अमेरिका में करीब 30%, यूरोप में 20% और अफ्रीका में लगभग 50% तक फ्यूल प्राइसेज बढ़ गए, वहीं भारत ने अपने नागरिकों को बचाने के लिए घरेलू कीमतें स्थिर रखीं।
OMCs पर आया संकट
इस फैसले का सीधा असर देश की प्रमुख ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) - इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL), और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) - पर पड़ा है। ये कंपनियां घरेलू फ्यूल मार्केट का करीब 90% हिस्सा कंट्रोल करती हैं। जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण कच्चे तेल की कीमतें $100 से $120 प्रति बैरल के बीच बनी हुई हैं। ऐसे में, OMCs अप्रैल 2022 से अपरिवर्तित कीमतों पर पेट्रोल और डीज़ल बेच रही हैं।
भारी अंडर-रिकवरी
सरकार का अनुमान है कि पेट्रोल पर ₹24 प्रति लीटर और डीज़ल पर ₹30 प्रति लीटर की 'अंडर-रिकवरी' (नुकसान) हो रही है। कुछ इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि डीज़ल पर यह नुकसान ₹40 प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। इस स्थिति के चलते मार्च 2026 में ही OMCs के स्टॉक में 23% से 25% तक की गिरावट आई है, जो निवेशकों की चिंता को दर्शाता है।
ग्लोबल मार्केट से उलट
दुनिया के ज़्यादातर देशों ने फ्यूल प्राइसिंग को मार्केट के भरोसे छोड़ दिया है, जिससे वहां कीमतें काफी बढ़ी हैं। भारत का कॉस्ट एब्जॉर्ब करने का फैसला एक अनूठी चुनौती है। जहां दुनिया भर के ऑयल उत्पादक ऊंचे दामों से मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं भारतीय मार्केटर्स के मार्जिन सिकुड़ रहे हैं। रिफाइनर्स का प्रॉफिट मार्जिन भले ही 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में अच्छा रहा हो, लेकिन यह रिटेल फ्यूल सेल्स के नुकसान की भरपाई नहीं कर पा रहा है। OMCs को ऐसी स्थिति का सामना 2022-23 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी करना पड़ा था।
फिस्कल डेफिसिट और रुपए का दबाव
इस प्राइसिंग स्ट्रेटेजी का असर भारत के फिस्कल डेफिसिट पर भी दिख रहा है, जिसके 2027 फाइनेंशियल ईयर के लिए 4.3% से 4.4% तक पहुंचने का अनुमान है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, अगर कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो 2026 फाइनेंशियल ईयर में भारत को जीडीपी का लगभग 0.7% और सरकारी रेवेन्यू का 7.2% नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, 93.22 के आसपास ट्रेड कर रहा कमजोर रुपया इम्पोर्टेड कच्चे तेल को और महंगा बना रहा है।
एनालिस्ट्स की चेतावनी
इस स्थिति को देखते हुए कई एनालिस्ट्स ने चेतावनी जारी की है और रेटिंग्स डाउनग्रेड की हैं। Ambit Institutional Equities ने IOC, BPCL और HPCL को 'सेल' रेटिंग दी है, वहीं UBS ने IOC और BPCL को 'न्यूट्रल' और HPCL को 'सेल' रेटिंग दी है। उनका मानना है कि अगर कीमतें ऊंची बनी रहीं तो इन कंपनियों की भविष्य की कमाई में भारी गिरावट आएगी। यह प्राइसिंग स्ट्रेटेजी, जो ग्राहकों को शॉर्ट-टर्म में राहत देती है, असल में अमीर लोगों को ज़्यादा फायदा पहुंचा रही है। OMCs के लिए लगातार अंडर-रिकवरी उनके डेट और बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ा सकती है।
आगे क्या?
जब तक ग्लोबल क्रूड प्राइसेज वोलेटाइल रहेंगे और डोमेस्टिक रिटेल प्राइसेज कैप्ड रहेंगे, तब तक OMCs के मार्जिन पर दबाव बना रहेगा। ब्रोकरेज फर्म्स का मानना है कि OMCs के स्टॉक्स में और गिरावट आ सकती है। सरकार का लक्ष्य 2027 फाइनेंशियल ईयर के लिए फिस्कल डेफिसिट को 4.3% के आसपास रखना है, लेकिन फ्यूल प्राइसिंग का मैनेजमेंट इस लक्ष्य को हासिल करने की सरकार की क्षमता की परीक्षा लेगा। यह नीति इन्फ्लेशन कंट्रोल करने और डोमेस्टिक डिमांड को सपोर्ट करने के बीच एक मुश्किल संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करती है।