कैसे होगा इतना बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन?
Niti Aayog की 10 फरवरी, 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन (Net-Zero Emission) के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पावर सेक्टर में 14.23 ट्रिलियन डॉलर (लगभग ₹1183 लाख करोड़) का अब तक का सबसे बड़ा निवेश करना पड़ेगा। इस बड़े वित्तीय कदम की मुख्य वजह बिजली की मांग में ज़बरदस्त बढ़ोतरी का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2025 में लगभग 1,400 kWh से बढ़कर 2070 तक 7,000–10,000 kWh तक पहुँच सकती है। नतीजतन, नेट-ज़ीरो रास्ते पर चलने के लिए कुल इंस्टॉल्ड पावर कैपेसिटी को मौजूदा स्तर से 14 गुना बढ़ाना होगा। यह रिपोर्ट साफ करती है कि भारत की विकास यात्रा सीधे तौर पर बिजली क्षेत्र के विकास से जुड़ी हुई है। 2025 में फाइनल एनर्जी कंजम्पशन (Final Energy Consumption) में बिजली की हिस्सेदारी 21% है, जो 2070 तक बढ़कर करीब 60% होने का अनुमान है।
रिन्यूएबल एनर्जी का दबदबा और स्टोरेज की अहमियत
Niti Aayog के अनुमानों के मुताबिक, 2070 तक पावर सिस्टम का 98% हिस्सा नॉन-फॉसिल फ्यूल (Non-Fossil Fuel) स्रोतों से आएगा। कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी का लगभग 90–93% रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) से होगा। सोलर पावर (Solar Power) इसमें सबसे आगे रहेगा, जिसकी कैपेसिटी 3,250–5,500 GW तक पहुँचने की उम्मीद है। इसके अलावा, 1,000 GW से ज़्यादा ऑनशोर विंड (Onshore Wind) और 50–70 GW ऑफशोर विंड (Offshore Wind) की क्षमता होगी। रिन्यूएबल एनर्जी की अनियमित प्रकृति (Intermittency) से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) की ज़रूरत होगी। 2070 तक बैटरी स्टोरेज कैपेसिटी 3,000 GW तक पहुँचने का अनुमान है, जिसमें 160 GW का पंपड हाइड्रो स्टोरेज (Pumped Hydro Storage) भी शामिल होगा।
न्यूक्लियर पावर का सहारा और मिनरल्स की चुनौती
रिन्यूएबल एनर्जी के अलावा, न्यूक्लियर पावर (Nuclear Power) भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। 2025 में 8.8 GW से बढ़कर 2070 तक इसकी क्षमता 300 GW से ज़्यादा हो जानी चाहिए, ताकि लो-कार्बन बेस लोड पावर (Low-Carbon Baseload Power) की सप्लाई सुनिश्चित हो सके। हालांकि, यह पूरा बदलाव क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) जैसे लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) की सुरक्षित सप्लाई पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है, जो बैटरीज, विंड टर्बाइन और सोलर पैनल के लिए ज़रूरी हैं। वर्तमान में भारत इन सामग्रियों के लिए आयात पर बहुत निर्भर है, खासकर उनकी प्रोसेसिंग के लिए जो ज़्यादातर चीन में केंद्रित है। यह निर्भरता सप्लाई चेन में बड़ी कमज़ोरियाँ पैदा करती है, जो भू-राजनीतिक (Geopolitical) प्रतिद्वंद्विता को भी बढ़ा सकती है। भारत ने 30 क्रिटिकल मिनरल्स की पहचान की है और जनवरी 2025 में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (National Critical Mineral Mission) लॉन्च किया है, जिसमें डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन, R&D और अंतरराष्ट्रीय सोर्सिंग को बढ़ावा देने के लिए ₹34,300 करोड़ का फंड आवंटित किया गया है।
कठिन राह: वित्तीय और इंफ्रास्ट्रक्चर की बाधाएं
पिछले पांच सालों में भारत के पावर सेक्टर ने तेज़ी से ग्रोथ की है, जो दुनिया में तीसरे स्थान पर है। 2024 में कुल पावर सेक्टर इन्वेस्टमेंट का 83% क्लीन एनर्जी (Clean Energy) में हुआ। 2024 तक नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी 44% तक पहुँच गई थी, जो 2030 के 50% लक्ष्य के करीब है। 2023 में पावर सेक्टर में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (Foreign Direct Investment) 5 अरब डॉलर रहा। हालांकि, ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) में कई बड़ी बाधाएं हैं। सबसे प्रमुख है बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) की खराब वित्तीय हालत, जिनके संचित घाटे (Accumulated Losses) प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग और पावर परचेज़ एग्रीमेंट (Power Purchase Agreements) में रुकावटें पैदा करते हैं। इसके अलावा, ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर (Grid Infrastructure) और ट्रांसमिशन कैपेसिटी (Transmission Capacity) जनरेशन कैपेसिटी की ग्रोथ से पिछड़ गई है, जिससे रिन्यूएबल इंटीग्रेशन (Renewable Integration) में दिक्कतें आ रही हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल कैपेसिटी का है, लेकिन वर्तमान रिन्यूएबल पाइपलाइन 234 GW के साथ चीन के 1,500 GW से काफी पीछे है।
आगे की राह और चुनौतियाँ
भारत के नेट-ज़ीरो पावर सेक्टर के लक्ष्यों को 2070 तक हासिल करने के लिए बड़ी वित्तीय, इंफ्रास्ट्रक्चरल और सप्लाई चेन की चुनौतियों से पार पाना होगा। 14.23 ट्रिलियन डॉलर का भारी-भरकम कैपिटल (Capital) जुटाना एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए मौजूदा स्तर से तीन गुना ज़्यादा वार्षिक निवेश की ज़रूरत होगी। क्रिटिकल मिनरल्स पर बढ़ती निर्भरता सेक्टर को वैश्विक बाज़ारों की अस्थिरता और भू-राजनीतिक दबावों के प्रति संवेदनशील बनाती है। DISCOMs की लगातार खराब वित्तीय स्थिति रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स को रोक सकती है। जनरेशन कैपेसिटी के मुकाबले ग्रिड और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का धीमा विकास भी स्थिरता के लिए एक बड़ा जोखिम है। हालांकि, कोयला 2047 तक भारतीय एनर्जी मिक्स का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा, जो एक जटिल और लंबी फेज-आउट प्रक्रिया का संकेत देता है। 2030 तक रिन्यूएबल कैपेसिटी को तीन गुना करने का लक्ष्य सराहनीय है, लेकिन इसके लिए भारी वार्षिक क्षमता वृद्धि की आवश्यकता होगी, जिसे हासिल करना कई विकसित देशों के लिए भी मुश्किल रहा है। इस बड़ी परिवर्तनकारी यात्रा की सफलता के लिए लगातार नीतिगत समर्थन, स्टोरेज टेक्नोलॉजी में बड़ी प्रगति और टिकाऊ कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) की ज़रूरत होगी।