वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल अस्थिरता के कारण अप्रैल से जुलाई **2026** के बीच भारत का नेचुरल गैस इंपोर्ट बिल **24%** बढ़कर **$5.6 बिलियन** पर पहुंच गया है।
भारत के एनर्जी इंपोर्ट का खर्च चालू फाइनेंशियल ईयर में तेजी से बढ़ रहा है। वेस्ट एशिया में तनाव के चलते सप्लाई चेन बाधित है, जिसका असर गैस बिल पर साफ दिख रहा है। अप्रैल-जुलाई 2026 की अवधि में इंपोर्ट वॉल्यूम में महज 5% की बढ़ोतरी हुई और यह 11,867 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (mmscm) रहा, लेकिन कुल बिल का आंकड़ा $5.6 बिलियन पर पहुंच गया।
फ्रेट लागत में जबरदस्त तेजी
कीमतें बढ़ने की मुख्य वजह गैस की बेसिक कीमत के साथ-साथ उसे भारत लाने का भारी-भरकम खर्च है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास तनाव के कारण शिपिंग कंपनियों को लंबे और जोखिम भरे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है। इसके चलते फ्रेट रेट्स और वॉर-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम में 137% से 411% तक की भारी उछाल देखी गई है।
अमेरिका पर बढ़ी निर्भरता
सप्लाई बाधित न हो, इसके लिए भारत अब अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए अमेरिका की ओर देख रहा है। अगस्त 2026 तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा LPG सप्लायर बन गया है, जो भारत के कुल LPG इंपोर्ट का 73% से अधिक है। हालांकि, यह विकल्प सुरक्षित तो है, लेकिन दूर होने की वजह से ट्रांजिट टाइम और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट काफी ज्यादा है।
घरेलू उत्पादन में गिरावट और इकोनॉमी पर दबाव
इस दौरान घरेलू नेचुरल गैस प्रोडक्शन भी 4.3% घटकर 11,245 mmscm रह गया। इससे भारत की विदेशी गैस पर निर्भरता 49.3% से बढ़कर 51.7% हो गई है। अप्रैल-जुलाई 2026 के बीच नेट ऑयल और गैस इंपोर्ट बिल 43.4% बढ़कर $57.8 बिलियन हो गया है, जो भारतीय रुपए पर दबाव डाल सकता है और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को भी बढ़ा सकता है।
