भारत में बिजली की मांग पूरी करने के लिए कोयले और अन्य ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ गई है। जून में, देश के जलविद्युत उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले लगभग 21% की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण मॉनसून का कमजोर रहना और जलाशयों में पानी का खतरनाक स्तर तक नीचे जाना है।
क्यों गिरी बिजली उत्पादन?
भारत में जलविद्युत उत्पादन में पिछले दो सालों में जून के महीने में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है। मॉनसून की देरी और अनियमितता इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह है। 1 जुलाई तक, पूरे भारत में सामान्य से 38% कम बारिश दर्ज की गई है।
जलाशयों में पानी का संकट
केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission) के मुताबिक, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में फिलहाल सिर्फ 47.7 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी बचा है। यह उनकी कुल क्षमता का केवल एक-चौथाई हिस्सा है और पिछले साल इसी समय के मुकाबले 39% कम है।
ऊर्जा ग्रिड पर दबाव
जलविद्युत, भारत के ऊर्जा मिश्रण का एक अहम हिस्सा है, लेकिन पानी की कमी के कारण इस बार बिजली उत्पादन में कमी आई है। इसकी भरपाई के लिए थर्मल (कोयला) और परमाणु ऊर्जा जैसे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ी है। हालांकि, अब तक पावर ग्रिड रिकॉर्ड बिजली खपत को पूरा करने में कामयाब रहा है। मई में बिजली की अधिकतम मांग 270.8 GW के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद, हालिया बारिश से थोड़ी राहत मिली है और जुलाई में मांग 250 GW से नीचे रही है।
खरीफ फसलों पर खतरा
जलाशयों में पानी की यह कमी खरीफ फसलों के लिए भी एक बड़े जोखिम का संकेत है। सिंचाई के लिए पानी की कम उपलब्धता बुवाई को प्रभावित कर सकती है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पावर और यूटिलिटी सेक्टर में निवेशक आने वाले हफ्तों में मॉनसून की प्रगति पर पैनी नजर रखेंगे।
आगे क्या?
ऊर्जा क्षेत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि जुलाई और अगस्त में मॉनसून कैसा रहता है। बेहतर बारिश से न केवल जलविद्युत उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि थर्मल पावर पर निर्भरता कम होने से बिजली उत्पादन की लागत भी कम हो सकती है।
