जेनरेशन आगे, ग्रिड पीछे: एनर्जी ट्रांजिशन का सबसे बड़ा रोड़ा
भारत का पावर सेक्टर इन दिनों जेनरेशन कैपेसिटी को लेकर नहीं, बल्कि उसे सप्लाई करने की क्षमता को लेकर जूझ रहा है। देश की कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 510 GW के पार जा चुकी है, लेकिन ग्रिड की कमजोरी के कारण इस बिजली को ठीक से इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। यह सिर्फ एक तकनीकी दिक्कत नहीं, बल्कि देश के एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) के लिए एक गंभीर आर्थिक खतरा पैदा कर रही है।
पावर कर्टेलमेंट का भारी बिल
2025 में यह समस्या और भी विकट हो गई। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अकेले मई से दिसंबर 2025 के बीच, लगभग 2.3 टेरावाट-घंटे (TWh) सोलर पावर को सिर्फ इसलिए रोकना पड़ा क्योंकि ग्रिड तैयार नहीं था। इस रोकी गई बिजली का मतलब है क्लीन एनर्जी की क्षमता का बर्बाद होना और सीधा आर्थिक नुकसान। सोलर जेनरेटर्स को लगभग $63 मिलियन से $76 मिलियन का हर्जाना देना पड़ा, वो भी उस पावर के लिए जो पहुंचाई ही नहीं जा सकी। राजस्थान और पश्चिमी भारत जैसे इलाकों में बड़ी मात्रा में सोलर और विंड पावर प्रोजेक्ट्स ग्रिड कनेक्टिविटी से पहले तैयार हो गए, जिससे पीक आवर्स में बिजली कट करनी पड़ी।
प्रोजेक्ट्स में देरी और कम Productivty
इसकी जड़ें प्लानिंग और एग्जीक्यूशन (Execution) के बीच बड़े गैप में हैं। जहां रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स 12 से 24 महीने में तैयार हो जाते हैं, वहीं इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स में तीन से पांच साल तक लग जाते हैं। खास तौर पर हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) जैसे जटिल प्रोजेक्ट्स में लंबी लीड टाइम, तकनीकी चुनौतियां और ज्यादा कैपिटल इन्वेस्टमेंट के कारण देरी और लागत बढ़ना आम बात है। इसके अलावा, भारत में ट्रांसमिशन सेक्टर में कंस्ट्रक्शन के तरीके अभी भी लेबर-इंटेंसिव (Labor-intensive) हैं, जिससे ग्लोबल बेंचमार्क की तुलना में प्रति सर्किट-किलोमीटर बहुत ज्यादा मैन-डेज लगते हैं। यह कम Productivty ग्रिड के तेजी से विस्तार की जरूरत के हिसाब से टिकाऊ नहीं है।
निवेशकों का भरोसा डगमगाया
लगातार ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में पिछड़ने से भारत के एनर्जी ट्रांजिशन की कहानी कमजोर दिख रही है। ग्रिड में कंजेशन (Congestion), रिन्यूएबल एसेट्स का कम इस्तेमाल और बढ़ती ऑपरेशनल दिक्कतें सामने आ रही हैं। ये खतरे की घंटी हैं जो अगर अनसुने किए गए तो निवेशकों का भरोसा तोड़ने का काम करेंगे। पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों का दबदबा और राज्यों में टैरिफ-बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) जैसे प्रभावी प्रोक्योरमेंट मैकेनिज्म को असमान रूप से अपनाना, एग्जीक्यूशन और टाइमिंग के रिस्क को और बढ़ा रहा है। ग्लोबल कैपिटल क्लीन-टेक में सतर्क हो रहा है, और ग्रिड लॉक जैसे स्ट्रक्चरल इम्पेडीमेंट्स (Structural Impediments) डायरेक्ट फॉरेन इन्वेस्टमेंट और प्राइवेट कैपिटल को हतोत्साहित कर सकते हैं।
आगे की राह: फॉरवर्ड-लुकिंग प्लानिंग और नई टेक्नोलॉजी
भारत के एनर्जी ट्रांजिशन के लिए अब यह जरूरी है कि जेनरेशन ग्रोथ और ग्रिड क्षमता के बीच तालमेल बैठाया जाए। 2026 के लिए प्राथमिकताएं ट्रांसमिशन प्लानिंग को आगे बढ़ाने पर होनी चाहिए, ताकि जेनरेटेड पावर के लिए कॉरिडोर पहले से तैयार रहें। ग्रिड इन्वेस्टमेंट में एडवांस सबस्टेशन और कंट्रोल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए स्थिरता पर जोर देना होगा। डायनामिक लाइन रेटिंग (DLR) और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स जैसे टूल्स का इस्तेमाल करके छुपी हुई क्षमता को अनलॉक करना होगा और पावर कर्टेलमेंट को कम करना होगा। क्रिटिकल ग्रिड टेक्नोलॉजीज की डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना भी अहम है। TBCB को स्टैंडर्डाइज करने से लागत अनुशासन और एग्जीक्यूशन प्रेडिक्टिबिलिटी बनी रहेगी। आखिरकार, भारत के एनर्जी फ्यूचर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्रिड कितनी मजबूत, स्थिर और तैयार है, न कि सिर्फ कितनी बिजली पैदा की जा रही है।
