यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है, बल्कि पावर सेक्टर की गहरी और प्रणालीगत (systemic) इनफ्लेक्सिबिलिटी का नतीजा है। सिर्फ कोयला बिजली संयंत्रों की ऑपरेशनल लिमिट ही नहीं, बल्कि कई बड़े कमर्शियल और रेगुलेटरी अड़चनें भी भारत के क्लीन एनर्जी लक्ष्यों को हासिल करने और निवेशकों का भरोसा बनाए रखने में बाधा बन रही हैं।
मुख्य कारण: कोयला प्लांट की सीमाएं और ग्रिड की चुनौतियाँ
नेशनल ग्रिड ऑपरेटर, GRID-India के अनुसार, पिछले साल मई से नवंबर 2025 के बीच 23 गीगावाट (GW) तक की रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड से अलग करना पड़ा। मई से दिसंबर 2025 की अवधि में कुल 2.3 टेरावाट-घंटे (TWh) का नुकसान हुआ, जो रिन्यूएबल एनर्जी जनरेटर्स को लगभग 63 मिलियन डॉलर से 76 मिलियन डॉलर के कंपनसेशन लागत के रूप में पड़ा। यह नुकसान सोलर एनर्जी के औसत मासिक जनरेशन का लगभग 18% है।
इस कर्टीमेंट (curtailment) का मुख्य कारण भारत के कोयला-आधारित थर्मल फ्लीट का एक बड़ा हिस्सा अपनी मिनिमम टेक्निकल लोड (MTL) यानी 55% से नीचे काम करने में असमर्थ होना था। जब दिन के दौरान, विशेष रूप से सोलर एनर्जी का उत्पादन बढ़ता है, तो ग्रिड को सप्लाई और डिमांड को संतुलित करने में कठिनाई होती है। यह स्थिति तब और गंभीर हो गई जब हल्के मौसम के कारण बिजली की डिमांड अनुमान से कम रही, और शाम को 60 GW तक की तेज 'रैंप-अप' (ramp-up) की जरूरत पड़ी, जिससे 'डक कर्व' (duck curve) जैसी जटिल स्थिति पैदा हुई।
GRID-India ने ग्रिड सुरक्षा जोखिमों का भी संकेत दिया, जिसमें पीक सोलर घंटों के दौरान अतिरिक्त सप्लाई के कारण सिस्टम फ्रीक्वेंसी को स्वीकार्य बैंड से बाहर जाने की घटनाएं शामिल हैं। रोकी गई यह रिन्यूएबल एनर्जी लगभग 21 लाख टन CO2 उत्सर्जन को रोकने में सक्षम थी।
विश्लेषण: वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत की स्थिति
दुनिया भर के देश उच्च रिन्यूएबल एनर्जी पेनिट्रेशन को प्रबंधित करने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपना रहे हैं। जर्मनी और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश इंटीग्रेटेड प्लानिंग, ट्रांसमिशन नेटवर्क के विस्तार, उन्नत डिमांड-साइड मैनेजमेंट और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) जैसे एनर्जी स्टोरेज समाधानों में भारी निवेश पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वहीं, डेनमार्क और पुर्तगाल ने मजबूत ग्रिड प्रबंधन और डिस्पैचेबल रिन्यूएबल स्रोतों के माध्यम से उच्च रिन्यूएबल एकीकरण की व्यवहार्यता का प्रदर्शन किया है।
भारत का पावर सेक्टर एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। नॉन-फॉसिल फ्यूल स्रोतों से अब इंस्टॉल्ड कैपेसिटी का लगभग 50% हिस्सा आता है। हालांकि, वास्तविक जनरेशन में उनका शेयर अभी भी लगभग 23% से 40% के बीच है, जो कैपेसिटी और डिस्पैच के बीच एक अंतर को उजागर करता है। 2025 में अकेले भारत ने रिकॉर्ड 38 GW सोलर कैपेसिटी जोड़ी है। यह तीव्र वृद्धि कोयला-आधारित नई कैपेसिटी के नियोजित विस्तार के साथ हो रही है, जिससे कोयला प्लांट के उपयोग की दरें अभूतपूर्व रूप से कम हो सकती हैं और जनरेटर्स को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि एनर्जी ट्रांजिशन के लिए 2026 से 2035 के बीच 1.5 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें ग्रिड आधुनिकीकरण और स्टोरेज के लिए वार्षिक 145 अरब डॉलर का अनुमान है। ट्रांसमिशन बाधाएं एक महत्वपूर्ण बाधा हैं, और नियोजित तथा कमीशन की गई ट्रांसमिशन लाइनों के बीच 42% का अंतर रिन्यूएबल कैपेसिटी को 'स्ट्रैंडेड' (stranded) कर रहा है। भारत की वर्तमान एनर्जी स्टोरेज कैपेसिटी (मार्च 2024 तक 4.7 GW पंपड हाइड्रो, 219 MWh BESS) 2030 के लक्ष्यों से काफी कम है।
समस्या की जड़: संरचनात्मक और वाणिज्यिक बाधाएं
मूल मुद्दा केवल कोयला प्लांट के न्यूनतम तकनीकी लोड का नहीं है, बल्कि अंतर्निहित वाणिज्यिक और नियामक ढांचे हैं जो आवश्यक थर्मल फ्लेक्सिबिलिटी को प्रोत्साहित करने में विफल रहते हैं। GRID-India और विश्लेषक केवल तकनीकी सीमाओं से परे संरचनात्मक मुद्दों की ओर इशारा करते हैं। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के पास 2030 तक कोयला-आधारित पावर प्लांट को 40% MTL पर संचालित करने में सक्षम बनाने के लिए एक रोडमैप है, लेकिन इसमें प्रगति धीमी है।
नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC) जैसी प्रमुख पावर उत्पादकों ने चिंता जताई है कि 40% MTL पर प्लांट चलाने से प्लांट का जीवनकाल एक तिहाई तक कम हो सकता है और रखरखाव की लागत बढ़ सकती है। इसके कारण वे 55% का न्यूनतम स्तर बनाए रखना चाहते हैं। यह स्थिति बताती है कि केवल दक्षता में कमी के मुआवजे से कहीं अधिक, व्यापक रूप से अपनाने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता है। वाणिज्यिक इनफ्लेक्सिबिलिटी, जैसे कि कोयले के लिए लंबी अवधि के पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPAs), अभी भी यूटिलिटीज को उच्च-लागत वाले थर्मल जनरेशन से बांधे हुए हैं, भले ही सस्ती रिन्यूएबल एनर्जी उपलब्ध हो, जिससे 'अनिवार्य कर् शामिल' (avoidable curtailment) हो रहा है।
इसके अलावा, डिस्ट्रीब्यूशन कंपनीज (DISCOMs) की वित्तीय सेहत एक लगातार चिंता का विषय बनी हुई है, जो ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी समाधानों में निवेश करने या उनके लिए अनुबंध करने की उनकी क्षमता को बाधित कर सकती है। नियोजित और कमीशन की गई ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच महत्वपूर्ण अंतर का मतलब यह भी है कि यदि जनरेशन कैपेसिटी मौजूद है, तो भी इसे हमेशा बाहर नहीं निकाला जा सकता है, जिससे कर्टीमेंट होता है।
अंतर्निहित जोखिम
यह प्रणालीगत इनफ्लेक्सिबिलिटी भारत के 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी के लक्ष्य के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करती है। यदि इसे संबोधित नहीं किया गया, तो ऊर्जा अस्थिरता की लंबी अवधि हो सकती है, अप्रत्याशित डिस्पैच के कारण रिन्यूएबल सेक्टर में निवेशकों का विश्वास कमजोर हो सकता है, और कम उपयोग की जाने वाली, उच्च-लागत वाली कोयला कैपेसिटी को विश्वसनीयता के लिए बनाए रखने से उपभोक्ताओं के लिए समग्र ऊर्जा लागत बढ़ सकती है।
रिन्यूएबल और स्टोरेज की गिरती लागत के बावजूद, कोयला कैपेसिटी पर निरंतर निर्भरता और इसका नियोजित विस्तार, स्ट्रैंडेड एसेट्स (stranded assets) और अकुशल पूंजी आवंटन (inefficient capital allocation) का कारण बन सकता है।
भविष्य का दृष्टिकोण
CEA ने 2030 तक कोयला-आधारित पावर प्लांट को 40% MTL पर संचालित करने में सक्षम बनाने के लिए एक चरणबद्ध रोडमैप प्रस्तुत किया है, जिसमें दो-शिफ्ट संचालन और बैटरी तथा पंप स्टोरेज सिस्टम की तैनाती जैसे उपायों को भी शामिल किया गया है। हालांकि, नियामक संरेखण (regulatory alignment) और इन उपायों को अपनाने की गति एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बनी हुई है। विश्लेषक इस बात पर जोर देते हैं कि भारत का एनर्जी ट्रांजिशन अब जनरेशन कैपेसिटी के बजाय फ्लेक्सिबिलिटी की कमी से अधिक बाधित हो रहा है।
उच्च रिन्यूएबल पेनिट्रेशन को सफलतापूर्वक एकीकृत करने के लिए न केवल तकनीकी उन्नयन की आवश्यकता होगी, बल्कि मार्केट डिजाइन, वाणिज्यिक अनुबंधों और नियामक ढांचों में मौलिक संरचनात्मक सुधारों के साथ-साथ ट्रांसमिशन और एनर्जी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर में पर्याप्त निवेश की भी आवश्यकता होगी। आगे का रास्ता भारत की स्वच्छ ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं की पूरी क्षमता को अनलॉक करने के लिए समन्वित योजना और प्रोत्साहनों की मांग करता है।
