Green Hydrogen Race: भारत के ₹19,744 करोड़ के मिशन में 50 से ज्यादा कंपनियां आमने-सामने

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Green Hydrogen Race: भारत के ₹19,744 करोड़ के मिशन में 50 से ज्यादा कंपनियां आमने-सामने

भारत के ग्रीन हाइड्रोजन सेक्टर में बड़ी हलचल मची है। Reliance Industries और Adani Group समेत 50 से अधिक दिग्गज कंपनियां अब इस मिशन की रेस में हैं। सरकार की **₹19,744 करोड़** की योजना के बाद अब सारा फोकस बिडिंग से हटकर प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन पर आ गया है।

ग्रीन हाइड्रोजन का 'महामुकाबला'

देश में ग्रीन हाइड्रोजन को लेकर कॉम्पिटिशन काफी तेज हो गया है। सरकार ने National Green Hydrogen Mission के तहत ₹19,744 करोड़ का फंड एलोकेट किया है। अब कंपनियां सिर्फ घोषणाएं करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और प्रोडक्शन फैसिलिटीज खड़ी करने की चुनौती से जूझ रही हैं।

इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग में तेजी

सरकार ने दो राउंड की बिडिंग में 3 गीगावाट सालाना इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी आवंटित की है। Reliance Industries, Adani New Industries और L&T Electrolysers जैसे दिग्गजों को इसमें अहम अलॉटमेंट मिले हैं। इस कदम का मुख्य मकसद इक्विपमेंट के आयात पर निर्भरता कम करना है, जिससे आने वाले समय में ग्रीन हाइड्रोजन का प्रोडक्शन सस्ता हो सके।

रेवेन्यू के लिए इंटरनेशनल मार्केट पर नजर

कंपनियां फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के लिए विदेशी बाजारों की ओर देख रही हैं। AM Green और ACME Group जैसी कंपनियां जापान और यूरोप के साथ लॉन्ग-टर्म सप्लाई एग्रीमेंट कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर, AM Green ने जर्मनी के साथ €585 मिलियन का बड़ा करार किया है। वहीं, L&T Energy GreenTech और ACME Group ने जापानी कंपनियों ITOCHU और IHI के साथ मिलकर अमोनिया और मेथनॉल सप्लाई के लिए हाथ मिलाया है, जो गुजरात के कांडला जैसे इंडस्ट्रियल हब्स के लिए काफी अहम है।

एग्जीक्यूशन और ऑपरेशन की बड़ी चुनौतियां

प्रोजेक्ट्स की बिडिंग तो सफल रही है, लेकिन असल परीक्षा अब शुरू होगी। सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने 7.24 लाख टन ग्रीन अमोनिया के लिए प्राइस तय कर दिए हैं, जो एक घरेलू डिमांड का आधार बनेगा। हालांकि, रिन्यूएबल पावर की उपलब्धता और इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन मानकों को पूरा करना बड़ी चुनौती है। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि अगर प्रोजेक्ट कमीशनिंग में देरी हुई या कैपिटल कॉस्ट बढ़ी, तो कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है। साथ ही, नई टेक्नोलॉजी में भारी निवेश के चलते बढ़ते कर्ज (Debt) के प्रबंधन पर नजर रखना भी जरूरी होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.