AM Green, ACME Group और L&T Energy GreenTech जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियों ने ग्रीन अमोनिया और मेथनॉल के लिए बड़े एक्सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट्स साइन किए हैं। अब ये कंपनियां पायलट प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़कर सीधे तौर पर कमर्शियल लेवल पर काम शुरू कर रही हैं।
भारत का ग्रीन हाइड्रोजन सेक्टर अब एक बड़े बदलाव की ओर है। अब तक जो कंपनियां सिर्फ पायलट प्रोजेक्ट्स तक सीमित थीं, वे अब बड़े बाइंडिंग ट्रेड एग्रीमेंट्स (Binding Trade Agreements) के जरिए ग्लोबल मार्केट में कदम रख चुकी हैं। यूरोप और जापान को होने वाली यह सप्लाई इंडस्ट्री को एक नया रेवेन्यू रोडमैप दे रही है।
बड़े सौदे और वॉल्यूम
AM Green ने जर्मनी के H2Global ऑक्शन के जरिए €585 मिलियन का 10 साल का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है। इसके अलावा, कंपनी जर्मनी की Uniper के साथ सालाना 5,00,000 टन रिन्यूएबल अमोनिया सप्लाई करने पर सहमत हुई है। वहीं, L&T Energy GreenTech ने जापान की ITOCHU Corporation के साथ गुजरात के कांडला में बनने वाले प्लांट से सालाना 3,00,000 टन ग्रीन अमोनिया सप्लाई करने का एग्रीमेंट किया है। ACME Group ने भी ओडिशा प्लांट से 10 साल के सप्लाई एग्रीमेंट साइन किए हैं, जिसमें IHI Corporation और Mitsubishi Gas Chemical जैसे ग्लोबल प्लेयर्स शामिल हैं।
इन सौदों का गणित
ग्रीन हाइड्रोजन का प्रोडक्शन अभी पारंपरिक ईंधन के मुकाबले महंगा है, लेकिन इन प्रोजेक्ट्स को जापान और जर्मनी की सरकारों से मिलने वाली सब्सिडी और 'कॉन्ट्रैक्ट-फॉर-डिफरेंस' जैसी स्कीमों का सहारा है। यह सपोर्ट ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा और गुजरात में बनने वाले बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के लिए जरूरी कैपिटल खर्च को मुनाफे में बदलने का भरोसा दिलाता है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को इन प्रोजेक्ट्स पर नजर रखने की जरूरत है। सबसे बड़ी चुनौती 'प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन' (Project Execution) की है, क्योंकि बड़े स्तर पर इलेक्ट्रोलाइजर और अमोनिया प्लांट लगाने में देरी से लागत बढ़ सकती है। साथ ही, इन कंपनियों का प्रॉफिट ग्लोबल सरकारी सब्सिडी पर काफी निर्भर है। यदि यूरोप या जापान की पॉलिसी में कोई बदलाव आता है, तो प्रोजेक्ट की इकोनॉमिक्स पर दबाव बन सकता है। निवेशकों को कंपनी के कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की रफ्तार को करीब से मॉनिटर करना चाहिए।
