नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के आवासों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के कारण देरी का सामना कर रहे प्रोजेक्ट्स को एक बड़ी राहत दी है। मंत्रालय ने इन देरी को 'फोर्स मैजोर' (Force Majeure) जैसी स्थिति माना है, जिससे लगभग 8.6 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स को पेनल्टी से बचाया जाएगा। यह फैसला उन परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी कमिशनिंग की तय तारीख (Scheduled Commercial Operations Date - SCOD) 21 मार्च 2024 से 19 दिसंबर 2025 के बीच थी। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च का अनुमान है कि इस देरी से लागत में 5% से 12% तक की वृद्धि हो सकती है, जिसे प्रोजेक्ट स्पॉन्सर (Sponsors) को वहन करना होगा, ताकि प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता (viability) बनी रहे।
यह सरकारी कदम, भले ही तात्कालिक वित्तीय संकट को कम करने के लिए हो, लेकिन यह भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में विकास लक्ष्यों और जैव विविधता संरक्षण के बीच चल रहे नाजुक संतुलन को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2024 और दिसंबर 2025 के फैसलों ने GIB संरक्षण को प्राथमिकता दी है और ट्रांसमिशन लाइनों के नियमों को बदल दिया है। इससे भविष्य में परियोजनाओं में और देरी या लागत बढ़ने का जोखिम बना हुआ है, जो इस राहत को एक स्थानीय समाधान की तरह पेश करता है, न कि किसी स्थायी हल की तरह।
सेक्टर की बात करें तो, भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करना है। हालांकि, तेजी से क्षमता बढ़ने के बावजूद, ग्रिड (Grid) की बिजली को अवशोषित करने की क्षमता सीमित है। इसके चलते बिजली की कटौती (curtailment) हो रही है और ट्रांसमिशन (transmission) व स्टोरेज (storage) जैसी ढांचागत कमियां सामने आ रही हैं। इस माहौल में, NTPC, NHPC और SJVN जैसे बड़े खिलाड़ियों के मूल्यांकन (valuation) में भिन्नता है। शुरुआती 2026 तक, NTPC का मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹370,000 करोड़ है, जिसका P/E अनुपात 16-23 के बीच है। NHPC का मार्केट कैप करीब ₹76,000 करोड़ और P/E 21-38 के बीच है। SJVN, जिसका मार्केट कैप लगभग ₹29,000 करोड़ है, 24-46 के उच्च P/E पर कारोबार कर रहा है। इन आंकड़ों के आधार पर, NTPC तुलनात्मक रूप से अधिक आकर्षक दिख रहा है। इसके अलावा, सेक्टर को सौर मॉड्यूल (solar module) की बढ़ती कीमतों और विनिर्माण (manufacturing) क्षेत्र में संभावित कंसॉलिडेशन (consolidation) का भी सामना करना पड़ रहा है।
भारतीय रिन्यूएबल एनर्जी के लिए नियामक परिदृश्य (regulatory landscape) लगातार जटिल होता जा रहा है। विकास की आवश्यकताएं और पर्यावरण संरक्षण के बीच सीधा टकराव बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट का GIB संरक्षण पर जोर, खासकर 2025 के अंत में आए फैसलों, जिन्होंने कुछ क्षेत्रों को 'नो-गो' क्षेत्र (no-go zones) घोषित किया, भविष्य में यह संकेत देते हैं कि ट्रांसमिशन की सीमाओं के कारण बड़ी मात्रा में रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 'स्ट्रैंडेड' (stranded) यानी बेकार हो सकती है। नवंबर 2025 में पर्यावरण मंजूरी (environmental clearances) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, जिसमें पूर्वव्यापी (retrospective) स्वीकृतियों पर प्रतिबंध की वापसी शामिल है, ने नियामक अनिश्चितता को बढ़ाया है और 'प्रदूषण करो और भुगतान करो' (pollute and pay) जैसे दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया है, जो पूर्व-सावधानी सिद्धांत (precautionary principle) के खिलाफ है। ये कारक सामूहिक रूप से परियोजना में देरी, लागत में वृद्धि और स्ट्रैंडेड संपत्तियों के जोखिम को बढ़ाते हैं, खासकर संवेदनशील क्षेत्रों की परियोजनाओं के लिए।
विश्लेषकों को उम्मीद है कि वाणिज्यिक और औद्योगिक मांग (commercial and industrial demand) और सरकारी पहलों से प्रेरित होकर भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में वृद्धि जारी रहेगी। हालांकि, सेक्टर को बढ़ते सौर मॉड्यूल की लागत और विनिर्माण में कंसॉलिडेशन जैसी चुनौतियों से निपटना होगा। ग्रिड विश्वसनीयता (grid reliability) के लिए 41 GW अतिरिक्त ऊर्जा भंडारण क्षमता (energy storage capacity) का सफल एकीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने वाला यह विकसित होता नियामक वातावरण, आने वाले समय में निवेश के विश्वास और परियोजना कार्यान्वयन की समय-सीमा को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।