भारत की ग्रीन एनर्जी पर बड़ा संकट! ग्रिड की कमी से अटक रहे प्रोजेक्ट्स, 2030 के लक्ष्य पर खतरा!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत की ग्रीन एनर्जी पर बड़ा संकट! ग्रिड की कमी से अटक रहे प्रोजेक्ट्स, 2030 के लक्ष्य पर खतरा!
Overview

भारत का ग्रीन एनर्जी सेक्टर एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। देश की रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) की ग्रोथ ग्रिड की क्षमता की कमी, ट्रांसमिशन लाइनों में देरी और एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) के गैप के चलते धीमी पड़ गई है। यह स्थिति इंवेस्टमेंट पर भारी फाइनेंशियल रिस्क (Financial Risk) पैदा कर रही है और साल **2030** तक के क्लीन एनर्जी टारगेट (Clean Energy Target) को खतरे में डाल सकती है।

स्ट्रक्चरल दबाव और बढ़ता फाइनेंशियल स्ट्रेन

भारत तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी (Renewable Energy Capacity) बढ़ा रहा है। अकेले 2025 में 38 गीगावाट (GW) से ज्यादा सोलर पावर (Solar Power) जोड़ी गई, जिससे नॉन-फॉसिल फ्यूल (Non-Fossil Fuel) कैपेसिटी अब 50% तक पहुंच गई है। लेकिन, यह ग्रोथ ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर (Grid Infrastructure) की क्षमता से कहीं ज्यादा तेज है। इसी वजह से 'कर्टेलमेंट' (Curtailment) की समस्या बढ़ रही है, जिसका मतलब है जनरेट की गई रिन्यूएबल एनर्जी को जानबूझकर कम करना। 2025 के मई से दिसंबर के बीच, 2.3 टेरावाट-घंटे (TWh) सोलर पावर को कर्टेल किया गया। यह इतनी बिजली है जिससे करीब 4 लाख घरों को एक साल तक रोशन किया जा सकता है। सिस्टम को बैलेंस करने और ट्रांसमिशन लाइनों की कमी के चलते ऐसा हो रहा है। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 के मार्च से अगस्त के बीच कम से कम 30 सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स (Solar and Wind Projects) को कर्टेलमेंट का सामना करना पड़ा, जिससे करीब ₹700 करोड़ तक का नुकसान हुआ। यह फाइनेंशियल नुकसान निवेशकों का भरोसा डिगा सकता है, जो देश के बड़े एनर्जी टारगेट को हासिल करने के लिए बेहद जरूरी है।

ट्रांसमिशन में देरी और ग्रिड की इनफ्लेक्सिबिलिटी बनी रुकावट

ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) का विस्तार, रिन्यूएबल एनर्जी के डिप्लॉयमेंट (Deployment) की रफ़्तार से पीछे छूट रहा है। इस फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के अगस्त तक, 15,382 किलोमीटर (km) के टारगेट के मुकाबले सिर्फ 1,998 किलोमीटर नई ट्रांसमिशन लाइनें ही चालू हो पाई हैं। इसके कारण लगभग 50 गीगावाट (GW) रिन्यूएबल कैपेसिटी (Renewable Capacity) 'फंसी' हुई है, यानी जनरेट होने के बावजूद इसे इस्तेमाल नहीं किया जा पा रहा। इसका मतलब है कि भले ही बिजली बन रही हो, लेकिन वह डिमांड सेंटर्स (Demand Centres) तक कुशलता से नहीं पहुंच पा रही। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया (Grid Controller of India) ने कुछ प्रोजेक्ट्स को व्यस्त समय में अपनी दैनिक जनरेशन का 48% तक कम करने का निर्देश दिया है। समस्या और बढ़ जाती है क्योंकि पुराने कोल पावर प्लांट्स (Coal Power Plants) को कम से कम 55% लोड पर चलाना पड़ता है। ऐसे में, जब दिन में सोलर पावर पीक पर होती है, तो इन कोल प्लांट्स को पर्याप्त रूप से डाउन नहीं किया जा पाता, जिससे ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी को कर्टेल करना पड़ता है। 2025 के मई से दिसंबर के बीच 2.3 TWh सोलर पावर कर्टेल होने की एक बड़ी वजह यही है कि कोल जनरेशन को इतना कम नहीं किया जा सका कि दोपहर की सोलर आउटपुट को एडजस्ट किया जा सके।

एनर्जी स्टोरेज: ग्रिड स्टेबिलिटी और निवेशकों के भरोसे के लिए जरूरी

एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) की अहमियत लगातार बताई जा रही है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने 2035-36 तक 100 गीगावाट (GW) की पंपड हाइड्रो स्टोरेज कैपेसिटी (Pumped Hydro Storage Capacity) का रोडमैप तैयार किया है। पंपड हाइड्रो को बड़े पैमाने पर ग्रिड बैलेंसिंग (Grid Balancing) के लिए सबसे बेहतर माना जाता है, क्योंकि यह स्टेबल और लॉन्ग-ड्यूरेशन (Long-Duration) फैसिलिटी है। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) भी सहायक भूमिका निभाएंगे, लेकिन लॉन्ग-ड्यूरेशन बैलेंसिंग के लिए पंपड हाइड्रो को मुख्य समाधान के तौर पर देखा जा रहा है। अनुमान है कि 2031-32 तक 411.4 गीगावाट-घंटे (GWh) एनर्जी स्टोरेज की जरूरत होगी, जिसमें 175.18 GWh पंपड हाइड्रो से और 236.22 GWh BESS से आएगा। एनर्जी स्टोरेज सिस्टम का मार्केट काफी बड़ा है, जो 2025 में $385 मिलियन का था और 2032 तक $947.4 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है, जिसमें 14.0% की सालाना ग्रोथ (CAGR) देखी जा रही है। फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) कर्टेलमेंट के रिस्क पर बारीकी से नजर रख रही हैं, क्योंकि यह बड़े रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स में इंवेस्टमेंट के भरोसे को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इसलिए, स्टोरेज सॉल्यूशंस को सफलतापूर्वक इंटीग्रेट करना सिर्फ ग्रिड की स्थिरता के लिए ही नहीं, बल्कि लगातार ग्रोथ के लिए जरूरी कैपिटल को आकर्षित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

निवेश पर खतरा: अटके हुए प्रोजेक्ट्स और लक्ष्य चूकने का जोखिम

बढ़ता हुआ कर्टेलमेंट और ट्रांसमिशन में देरी, रिन्यूएबल एनर्जी एसेट्स (Renewable Energy Assets) के 'Stranded' होने का बड़ा रिस्क पैदा कर रहा है। ट्रांसमिशन की रुकावटों के कारण पहले से ही लगभग 50 GW रिन्यूएबल कैपेसिटी फंसी हुई है। अगर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट (Infrastructure Development) तेजी से नहीं हुआ तो यह स्थिति और बिगड़ सकती है। यह फंसी हुई कैपेसिटी न केवल क्लीन एनर्जी के नुकसान का प्रतीक है, बल्कि डेवलपर्स और निवेशकों के लिए एक बड़ा फाइनेंशियल बोझ भी है। इसके अलावा, नए और बड़े डेटा सेंटर्स (Data Centres) की बढ़ती मांग भी पहले से ही दबाव वाले ग्रिड पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। अगर इन समस्याओं को दूर नहीं किया गया, तो भारत 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी का लक्ष्य हासिल करने से चूक सकता है। देश के ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी लाने की जरूरत है; उदाहरण के लिए, अगस्त तक 15,382 किलोमीटर के टारगेट के मुकाबले सिर्फ 1,998 किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइनें ही जोड़ी गईं। ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स, जिनमें आम तौर पर दो साल लगते थे, उन्हें अब राइट-ऑफ-वे (Right-of-Way) चुनौतियों और एग्जीक्यूशन की दिक्कतों के कारण तीन साल तक लग सकते हैं। इसके फाइनेंशियल असर गंभीर हैं, और एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि यह ट्रेंड निवेशकों के भरोसे को कम कर सकता है और भारत के 2030 के कैपेसिटी लक्ष्यों को खतरे में डाल सकता है।

भविष्य की राह: स्टोरेज और ट्रांसमिशन हैं ग्रोथ के पिलर

भविष्य की राह ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) के डेवलपमेंट में तेजी लाने और बड़े पैमाने पर एनर्जी स्टोरेज सॉल्यूशंस (Energy Storage Solutions) को तैनात करने पर निर्भर करती है। हालांकि भारत पोटेंशियल-बेस्ड ट्रांसमिशन प्लानिंग (Potential-based Transmission Planning) को अपना रहा है, लेकिन राइट-ऑफ-वे की चुनौतियों और एग्जीक्यूशन की दिक्कतों के कारण इसके लागू होने की समय-सीमा प्रभावित हो रही है। ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बेहद अहम है। अनुमान है कि 600 GW रिन्यूएबल को इंटीग्रेट करने के लिए 2032 तक ट्रांसमिशन एक्सपेंशन (Transmission Expansion) के लिए ₹2.4 लाख करोड़ की जरूरत होगी। साथ ही, अगले दशक में लगभग 100 GW पंपड हाइड्रो स्टोरेज (Pumped Hydro Storage) को इंटीग्रेट करने की योजनाएं ग्रिड स्थिरता के लिए केंद्रीय हैं। सेक्टर की कैपिटल (Capital) को आकर्षित करने की क्षमता, विश्वसनीय ग्रिड इंटीग्रेशन (Grid Integration) और मजबूत फाइनेंशियल रिटर्न्स (Financial Returns) प्रदर्शित करने पर निर्भर करेगी, जो इन सिस्टमैटिक रुकावटों को दूर करके ही हासिल की जा सकती है। IMARC के अनुमान के मुताबिक, अगर इन महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर चुनौतियों का सामना किया गया, तो रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट 2034 तक $52.58 बिलियन तक पहुंच जाएगा, जिसमें 2026-2034 के दौरान 8.16% की सालाना ग्रोथ (CAGR) देखी जाएगी।

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