स्पॉट मार्केट पर निर्भरता का आर्थिक बोझ
नेचुरल गैस के लिए स्पॉट मार्केट पर निर्भरता अब एक रणनीतिक पसंद नहीं, बल्कि एक मजबूरी बन गई है, जिसने भारत के पावर सेक्टर पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है। पश्चिम एशिया में सप्लाई चेन की अस्थिरता के चलते लंबी अवधि के LNG कॉन्ट्रैक्ट (Contract) ठप पड़ गए हैं। ऐसे में, घरेलू जेनरेटर तेजी से हाई-फ्रीक्वेंसी स्पॉट मार्केट की ओर धकेले जा रहे हैं।
यह स्थिति फिक्स्ड-प्राइस पावर परचेज एग्रीमेंट (Power Purchase Agreement) और ग्लोबल गैस इंडेक्स (Global Gas Index) की रियल-टाइम अस्थिरता के बीच एक बड़ा गैप पैदा कर रही है। जेनरेटरों को प्रीमियम कीमतों पर गैस खरीदनी पड़ रही है ताकि गर्मी की पीक डिमांड (Peak Demand) को पूरा किया जा सके, जिसे न तो कोयला और न ही घरेलू गैस रिजर्व्स पूरा कर पा रहे हैं। इससे उनके मार्जिन पर भारी दबाव पड़ रहा है।
सप्लाई की कमी और सिस्टम की खामी
इस संकट की जड़ में घरेलू सप्लाई चेन की विफलता है। आंकड़े बताते हैं कि गैस-ग्रिड से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को अलॉट किए गए 30.18 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रति दिन (MMSCMD) और असल में डिलीवर किए गए 4.33 MMSCMD के बीच एक बड़ा अंतर है। यह लगातार अंडरपरफॉर्मेंस (Underperformance) सिर्फ एक लॉजिस्टिक समस्या नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक रिस्क (Systematic Risk) है जो प्राइवेट पावर सेक्टर को मार्केट के उतार-चढ़ाव के सामने ला खड़ा करता है।
सरकारी कंपनियों के विपरीत, जिन्हें एडमिनिस्ट्रेटिव बफर (Administrative Buffer) का फायदा मिल सकता है, इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स (Independent Power Producers) स्पॉट कीमतों के प्रति संवेदनशील हैं। पिछले साल के मुकाबले स्पॉट कीमतें 77% तक बढ़ गई हैं, जिससे गैस-आधारित बिजली उत्पादन की व्यवहार्यता लगातार कम हो रही है।
निवेशकों के लिए जोखिम
निवेशकों को स्पॉट मार्केट पर इस निर्भरता को लंबी अवधि की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) के लिहाज से संदेह की नजर से देखना चाहिए। मुख्य जोखिम प्राइसिंग पावर (Pricing Power) की कमी में है; पावर जेनरेटरों पर अक्सर रेगुलेटरी कैप (Regulatory Cap) लगी होती है कि वे एंड-यूजर (End-user) से कितना चार्ज कर सकते हैं, जबकि इनपुट कॉस्ट (Input Cost) बेकाबू है।
वर्तमान ऑपरेशनल माहौल मिड-टियर गैस-आधारित जेनरेटरों के लिए बिल्कुल भी टिकाऊ नहीं है, जिनके पास लगातार ऊंची कीमतों पर खरीद जारी रखने के लिए पर्याप्त बैलेंस शीट (Balance Sheet) नहीं है। इसके अलावा, लगातार कम प्लांट लोड फैक्टर (PLF) बताता है कि गैस की भारी मांग के बावजूद, एसेट्स (Assets) का कुशलता से उपयोग नहीं हो पा रहा है। इससे एसेट इम्पेयरमेंट चार्ज (Asset Impairment Charges) या अत्यधिक लीवरेज्ड (Leveraged) कंपनियों के लिए क्रेडिट डिग्रेडेशन (Credit Degradation) का खतरा बढ़ सकता है। स्थिर कीमत वाली लंबी अवधि की सप्लाई हासिल करने में असमर्थता, पीक पावर डिमांड में बढ़ोतरी के बावजूद, प्रॉफिटेबिलिटी पर एक बड़ी बाधा है।
आगे का रास्ता और सेक्टर का आउटलुक (Outlook)
आगे चलकर, जब तक पश्चिम एशिया के व्यापार मार्ग बाधित रहेंगे, बाजार में अस्थिरता बने रहने की उम्मीद है। ब्रोकरेज की राय है कि अगर सरकार गैस-फायर्ड यूटिलिटीज (Gas-fired Utilities) के लिए प्राइस गैप (Price Gap) को पाटने के लिए हस्तक्षेप नहीं करती है, तो पूरे फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में सेक्टर में कमाई का दबाव जारी रह सकता है।
इंस्टीट्यूशनल पार्टिसिपेंट्स (Institutional Participants) का ध्यान उन कंपनियों पर रहेगा जिनके पास सबसे विविध एनर्जी पोर्टफोलियो (Energy Portfolio) हैं, क्योंकि सिर्फ गैस पर निर्भर जेनरेटर कमोडिटी प्राइस रिस्क (Commodity Price Risk) और रेगुलेटरी झिझक, दोनों का सामना करेंगे।
