ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल का भाव **$123** प्रति बैरल के पार निकलने के बावजूद भारत में पेट्रोल की कीमतें स्थिर हैं। सरकार की एक्साइज ड्यूटी में **₹10** प्रति लीटर की कटौती और सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) द्वारा **₹21,300 करोड़** के नुकसान को खुद वहन करने से आम जनता को राहत मिली है, लेकिन अब निवेशकों की नजर इस रणनीति की सस्टेनेबिलिटी पर है।
भारत का फ्यूल मार्केट इन दिनों ग्लोबल क्रूड कीमतों और घरेलू रिटेल प्राइस के बीच के बड़े अंतर को संभालने की कोशिश कर रहा है। सितंबर 2026 में इंडियन क्रूड बास्केट $123 प्रति बैरल के पार रहने के बावजूद, दिल्ली में पेट्रोल की कीमतों में सिर्फ 7% से 8% की मामूली बढ़ोतरी हुई है। इसका मकसद महंगाई के बड़े झटकों को आम लोगों से दूर रखना है।
रिटेलर्स पर वित्तीय दबाव
प्राइस कंट्रोल के लिए सरकार ने दो बड़े कदम उठाए: एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती और सरकारी तेल कंपनियों (Indian Oil, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum) पर अंडर-रिकवरी का बोझ। फरवरी से मार्च 2026 के बीच, इन OMCs ने लगभग ₹21,300 करोड़ का नुकसान खुद सहा है। इसका मतलब है कि कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल को उनकी लागत से कम दाम पर बेचा, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ा है।
सप्लाई चेन और इथेनॉल का सहारा
भारत अपनी 88.5% क्रूड जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के पास तनाव के कारण सप्लाई चेन पर खतरा था, जिसे देखते हुए अधिकारियों ने 70% क्रूड शिपमेंट को सुरक्षित रास्तों से रिरूट किया। इसके अलावा, 20% इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम ने भी बफर का काम किया है। विदेशी क्रूड की जगह घरेलू इथेनॉल का इस्तेमाल करने से आयात की निर्भरता कम हुई और कीमतों में आई अस्थिरता का असर काफी हद तक सीमित रहा।
निवेशकों के लिए क्या है आगे?
बाजार के जानकारों का मानना है कि यह स्थिति लंबे समय तक नहीं खिंच सकती। निवेशक अब तीन अहम चीजों पर नजर रखे हुए हैं: सरकार के पास एक्साइज कट जारी रखने की कितनी वित्तीय गुंजाइश है, क्या OMCs अपना मार्जिन बचा पाएंगी, और अगर ग्लोबल दाम कम नहीं हुए, तो क्या सरकार रिटेल कीमतों में और बढ़ोतरी करेगी? फिलहाल यह स्थिरता एक सरकारी चुनाव है, जिसकी कामयाबी सरकारी खजाने और तेल कंपनियों की हेल्थ के बैलेंस पर टिकी है।
