भारत की एथेनॉल प्रोडक्शन क्षमता अब **2,000 करोड़ लीटर** के स्तर को छू चुकी है, जो कि E20 फ्यूल की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है। अब इंडस्ट्री का फोकस क्षमता बढ़ाने के बजाय फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों और इंडस्ट्रियल डिमांड पर टिक गया है।
भारत का एथेनॉल सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पिछले एक दशक में प्रोडक्शन क्षमता 421 करोड़ लीटर (2014) से बढ़कर 2,000 करोड़ लीटर (2026 तक) हो गई है। पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने के E20 लक्ष्य को पूरा करने के बाद, अब सरकार और कंपनियां लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी पर ध्यान दे रही हैं।
कच्चे माल का बदलता गणित
इंडस्ट्री अब पूरी तरह से गन्ने पर निर्भर नहीं है। अब 70% एथेनॉल अनाज आधारित फीडस्टॉक से आ रहा है। अकेले मक्के (Maize) का योगदान 345 करोड़ लीटर है। यह बदलाव चीनी उद्योग को उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए है, लेकिन अनाज पर निर्भरता बढ़ने से खाद्य सुरक्षा (Food Security) और महंगाई को लेकर नए जोखिम भी पैदा हो रहे हैं।
अगला लक्ष्य: फ्लेक्स-फ्यूल और इंडस्ट्री
रोड ट्रांसपोर्ट में एथेनॉल की मांग पूरी होने के बाद, अब फोकस फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (FFVs) पर है। यदि इनका चलन बढ़ता है, तो यह अतिरिक्त 312 करोड़ लीटर एथेनॉल की खपत कर सकते हैं। इसके अलावा, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) और बायो-केमिकल्स को भी ग्रोथ के नए इंजन के रूप में देखा जा रहा है।
निवेशकों के लिए अहम बातें
निवेशकों को अब सिर्फ डिस्टिलरीज की संख्या नहीं, बल्कि फीडस्टॉक की कीमतों में उतार-चढ़ाव पर नजर रखनी चाहिए। अनाज की कीमतों में बदलाव सीधे प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, सरकार की 'फूड वर्सेज फ्यूल' पॉलिसी पर भी नजर बनाए रखें, क्योंकि अगर अनाज के इस्तेमाल पर कोई पाबंदी आती है, तो ग्रेन-बेस्ड डिस्टिलरीज का रेवेन्यू प्रभावित हो सकता है।
