भारत ने **20%** इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया है। अब देश की कुल क्षमता **2,000 करोड़ लीटर** तक पहुंच गई है, जो जरूरत से कहीं ज्यादा है। अब निवेशकों का ध्यान कैपेसिटी एक्सपेंशन से हटकर कच्चे माल की उपलब्धता और प्लांट यूटिलाइजेशन पर होना चाहिए।
भारत ने अपने एनर्जी रोडमैप में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य पूरा कर लिया है। अब इंडस्ट्री का फोकस नई कैपेसिटी बनाने के बजाय सप्लाई चेन को मजबूत करने और सस्टेनेबल मुनाफे पर शिफ्ट हो रहा है।
आंकड़ों की जुबानी (Capacity Growth)
इथेनॉल प्रोडक्शन की क्षमता में जबरदस्त उछाल आया है। साल 2014 में यह महज 421 करोड़ लीटर थी, जो 2026 तक बढ़कर 2,000 करोड़ लीटर के करीब पहुंच गई है। फिलहाल देश की जरूरत 1,212 करोड़ लीटर के आसपास है, यानी क्षमता जरूरत से कहीं ज्यादा है। अब असली खेल प्लांट को सुचारू रूप से चलाने का है।
रॉ मटेरियल में आया बड़ा बदलाव
अब इथेनॉल बनाने का तरीका बदल गया है। कुल सप्लाई का 72.5% हिस्सा अब अनाज (मक्का और चावल) से आता है, जबकि बाकी का हिस्सा शुगर-बेस्ड है। यह बदलाव इसलिए लाया गया ताकि गन्ने की फसल की अनिश्चितता से बचा जा सके, लेकिन इससे कंपनियां अब अनाज की कीमतों और सरकारी नीतियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई हैं।
मुनाफे पर क्या होगा असर?
डिस्टिलरी सेक्टर बहुत ज्यादा कैपिटल-इंटेंसिव है, जिसका मतलब है कि इनका फिक्स्ड कॉस्ट (ब्याज, मेंटेनेंस और स्टाफ खर्च) काफी ऊंचा होता है। अगर कच्चे माल की कमी के कारण प्लांट कम कैपेसिटी पर चलते हैं, तो प्रति लीटर लागत बढ़ जाती है और मार्जिन सीधे तौर पर गिर जाता है।
निवेशकों के लिए काम की बात
आने वाले समय में उन कंपनियों के शेयर बेहतर प्रदर्शन करेंगे जो रॉ मटेरियल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को बेहतर मैनेज करेंगी। निवेशकों को सरकार की 'शुगर-टू-इथेनॉल' डायवर्जन पॉलिसी और अनाज की कीमतों पर नजर रखनी चाहिए। केवल कैपेसिटी को न देखें, बल्कि यह देखें कि कौन सी कंपनी अपने प्लांट का कितना बेहतर इस्तेमाल कर रही है (Capacity Utilisation)।
