भारत का लक्ष्य 2031 तक इथेनॉल ब्लेंडिंग को E25 और E30 तक ले जाना है। हालांकि यह सेक्टर के लिए वॉल्यूम के लिहाज से अच्छा है, लेकिन बढ़ती फीडस्टॉक लागत और सरकारी सब्सिडी खत्म होने से निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है।
भारत का इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। सरकार का लक्ष्य 2031 तक E25 और E30 के स्तर को हासिल करना है ताकि एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो सके। हालांकि, यह बदलाव कंपनियों के लिए कई चुनौतियों और अवसरों का मिश्रण लेकर आया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और क्षमता की चुनौती
फिलहाल देश की डिस्टिलेशन क्षमता 18.25 अरब लीटर है। E25 ब्लेंडिंग तक पहुंचने पर यूटिलाइजेशन रेट 98% तक पहुंच जाएगा, जिससे सप्लाई चेन में बफर खत्म हो जाएगा। E30 के लक्ष्य के लिए मांग बढ़कर 21.5 अरब लीटर हो जाएगी, जिसके लिए भारी कैपएक्स (Capex) की जरूरत होगी। निवेशकों के लिए यहाँ फर्क है—एक तरफ Praj Industries जैसी कंपनियां हैं जो टेक्नोलॉजी प्रदान करती हैं, और दूसरी तरफ Balrampur Chini Mills, Triveni Engineering, और Dalmia Bharat Sugar जैसी कंपनियां हैं जिन्हें अपना विस्तार खुद फंड करना होगा।
मार्जिन पर दबाव और फीडस्टॉक की समस्या
अब उत्पादन का रुख गन्ने से हटकर अनाज (खासकर मक्का) की तरफ मुड़ गया है, जो कुल फीडस्टॉक का 46% है। इसका असर मुनाफे पर साफ दिख रहा है। अनाज आधारित डिस्टिलरीज का EBITDA मार्जिन जो FY21 में 9.2% था, वह FY25 तक गिरकर 6.7% रह गया है। अनाज की कीमतों में उतार-चढ़ाव होने पर कंपनियां ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर लागत का बोझ नहीं डाल पा रही हैं।
सरकारी सब्सिडी का असर
कंपनियों के लिए एक और बड़ी मुश्किल 'इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम' (Interest Subvention Scheme) का बंद होना है, जो FY26 से FY28 के बीच खत्म हो जाएगी। सब्सिडी हटने के बाद बैंक लोन देने में ज्यादा सतर्क होंगे, जिससे छोटी और कम कुशल कंपनियों के लिए कर्ज का बोझ बढ़ सकता है। भविष्य में निवेशकों को कंपनियों की मार्जिन प्रोटेक्शन क्षमता और सरकारी पॉलिसी के रोलआउट पर बारीक नजर रखनी होगी।
